गुड्स एंड सेल्स टैक्स को लागू हुए तीन माह का वक्त बीत चुका है। एक समय व्यापारी वर्ग जीएसटी लागू होने को लेकर काफी उत्साहित था और जीएसटी लागू होने के बाद उसी व्यापारी वर्ग के चेहरे पर तनाव है। कहीं एचएसएन कोड को लेकर तो कहीं जीएसटी की रिटर्न को लेकर।
अमर उजाला ‘संवाद’ में व्यापारियों ने अपनी परेशानियां बताईं। साथ ही कुछ बहुमूल्य सुझाव भी दिए। ज्यादातर व्यापारियों का कहना है कि जीएसटी स्वीकार्य है पर उसको आसान किया जाना चाहिए। रिटर्न त्रैमासिक की जानी चाहिए और एचएसएन कोड को खत्म करके कुछ चुनिंदा कैटेगरी बना देनी चाहिए। एक राष्ट्र एक टैक्स की बात लागू होनी चाहिए। क्योंकि जीएसटी में भी तीन तरह के टैक्स लाद दिए गए हैं।
28 फीसदी के बजाय 18 फीसदी हो टैक्स
जीएसटी के लागू होने के बाद व्यापारिक समुदाय काफी उलझ गया है। कई बड़े व्यापारी हैं और उनसे तीन गुणा छोटे व्यापारी, जिनके पास कंप्यूटराइज्ड सिस्टम ही नहीं है। ऐसे में जीएसटी-1, 2 और 3 भरने में उनके लिए उलझन है। हम यह नहीं कहते हैं कि जीएसटी गलत है बल्कि हमारा कहना है कि इसके लिए प्रावधान को आसान किया जाना चाहिए। ट्रांसपोर्टरों को जीएसटी के बाद समस्या हुई तो चक्का जाम हुआ और जीएसटी हटा दिया गया और उसको व्यापारियों पर लगा दिया गया। ऐसे में व्यापारी वर्ग की समस्याएं बढ़ती ही जा रही हैं। यह बात समझ नहीं आती है कि पहले चार्ज लगाओ और फिर रिफंड लो, इसको आसान किया जाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि छोटे व्यापारियों के बारे में विचार करे और इसकी सीमा बढ़ाकर डेढ़ करोड़ तक कर दे, जिससे काफी व्यापारी इससे निकल जाएंगे। 28 फीसदी जीएसटी काफी ज्यादा है, इसको 18 फीसदी तक लाना चाहिए। इससे कलेक्शन भी ज्यादा होगा, देश की अर्थव्यवस्था भी तेजी के साथ आगे बढ़ेगी।
चरंजीव सिंह, चेयरमैन, चंडीगढ़ व्यापार मंडल
जीएसटी ने दिक्कतें बढ़ा दीं
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जीएसटी लागू के बाद से व्यापारी डरे और सहमे हैं। जीएसटी हो या कोई अन्य टैक्स, व्यापारी इसको कलेक्ट करते हैं और सरकार को पहुंचाते हैं। आवश्यक यह है कि पहले तो कलेक्शन करने वाले को सारा मामला स्पष्ट होना चाहिए। उसको समझ में तो आए कि वह जो टैक्स लगा रहा है उसको कैसे ग्राहकों को समझाए। हम खुद उलझ चुके हैं। हमको ग्राहकों को यह बताना काफी मुश्किल होता है कि टैक्स की क्या दरें हम लगा रहे हैं। पहले हम खुश थे कि लगता था जीएसटी मुश्किलों का हल करेगा लेकिन यह तो खुद मुश्किल बन गया। सरकार अगर जीएसटी का स्लैब कम करे तो कलेक्शन ज्यादा होगा। पेंट पर जीएसटी 28 फीसदी, टाइल पर 28 फीसदी और तो और खाने पीने की चीजों में भी जबरदस्त टैक्स लगा है। अगर हम खड़े होकर रसमलाई खाएंगे तो पांच फीसदी टैक्स और बैठ गए तो 18 फीसदी टैक्स। अब शिमला जैसी जगह पर एसी या नॉन एसी जैसी कोई बात नहीं वहां भी टैक्स का हाल बुरा है।
नीरज बजाज, अध्यक्ष, चंडीगढ़ बिजनेस काउंसिल
हम हरेक प्रकार का टैक्स देने के लिए तैयार हैं। 18 फीसदी हो या 28 फीसदी। हमारे लिए परेशानी यह है कि जीएसटी को लेकर कई भ्रांतियां हैैं। कोई स्पष्टता नहीं है। तीन माह बीत चुके हैं और जीएसटी के संबंध में अब तक कुछ भी स्पष्ट नहीं है। सबसे ज्यादा परेशानी एचएसएन कोड की है। पहले यह ढूंढो कि कौन से प्रोडक्ट पर क्या टैक्स लगेगा और उसके बाद जीएसटी का नया रिटर्न स्लैब पूरा करते घूमो। समस्या इतनी ही नहीं है, टैक्स कहां लगाना है और कहां नहीं, इसमें भी कनफ्यूजन है। हम लोग टैक्स देना चाहते हैं और दे भी रहे हैं। सरकार को जीएसटी के लिए तैयार किए गए प्रावधानों को आसान करना चाहिए। जीएसटी के लिए चर्चा हो रही थी तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि इसका स्लैब 14 से 16 फीसदी तक होना चाहिए। वास्तव में वह ठीक कह रहे थे। जीएसटी लगाने के बाद ऐसा लगता है कि यह एक मखौल जैसा गेम बन चुका है।
एलसी अरोड़ा, महासचिव, चंडीगढ़ बिजनेस काउंसिल
ब्यूरोक्रेट के लिए है जीएसटी
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अब आप देखें कि सरकार ने चावल, दाल, पोहे और अन्य खाद्य पदार्थों पर जीएसटी की दर जीरो फीसदी कर दी है। सरकार ने कहा था कि नौ सितंबर तक जो ब्रांड रजिस्टर नहीं हैं या जिन्होंने रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन नहीं दिया वह ब्रांड माने जाएंगे। अब समस्या यह है कि आम लोगों को क्या मालूम कि कोई ब्रांड रजिस्टर है कि नहीं। लूज आटे का दाम अलग है और ब्रांडेड आटे के दाम अलग। कारण है जीएसटी। मैन्युफैक्चरर से हो या सप्लायर से, किसी को क्या मालूम कि यह ब्रांड रजिस्टर है कि नहीं। कंज्यूमर के लिए आवश्यक आइटम को चाहे वह ब्रांडेड हो या अनब्रांडेड उसको जीरो फीसदी ही कर दिया जाना चाहिए। इससे भ्रांति हो रही है और व्यापारियों को ज्यादा परेशानी हो रही है। दूसरी बात यह है कि ऐसा नहीं है कि टैक्स एकदम से थोप दिया गया। टैक्स पहले भी लगता था और वैट मासिक रूप से ही जाता था। हां, जीएसटी के नए सिस्टम में रिटर्न को त्रैमासिक किया जाना चाहिए।
राम करण गुप्ता, जीएसटी कमेटी चेयरमैन, चंडीगढ़ व्यापार मंडल
जीएसटी वास्तव में ब्यूरोक्रेट के लिए है। जीएसटी को लेकर व्यापारी वर्ग को अपेक्षा कर रहा था, उसकी टैक्स में राहत की जो आशाएं थीं वह ध्वस्त हो गईं। अभी तो ज्यादा समस्याएं नहीं हैं। आने वाले समय में समस्याएं ज्यादा होनी हैं। हमारी वास्तविक आवश्यकताएं रोटी, कपड़ा और मकान हैं। अगर देखें तो हालात अभी भी बदले नहीं हैं। आर्थिक रूप से कमजोर को मकान देने की बात की जा रही है और आर्थिक रूप से कमजोर अपने मकान तैयार भी कर रहे हैं और इसी ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि सीमेंट में पंद्रह फीसदी टैक्स है, अन्य आइटम में 28 फीसदी टैक्स। यह टैक्स आर्थिक रूप से कमजोर और सबल दोनों ही प्रकार के लोगों के लिए है। वास्तव में रियल एस्टेट पर इसकी वजह से अंतर आया है। सीमेंट का काम डाउन हो गया है। अब इस टैक्स में सरकार गरीब और समर्थ लोगों के बीच कैसे अंतर करेगी। हो यह रहा है कि एक एक्सपोर्ट डाक्यूमेंट तैयार करना है तो पंद्रह दिन लगेंगे और ऐसा ही काम और भी हो रहा है।
प्रेम गुप्ता, उद्यमी
मैनुअली बिल काटने वाले सबसे ज्यादा परेशान
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जीएसटी हमारे ऊपर है ही नहीं, यह सीधे कंज्यूमर के ऊपर है। ऐेेसा नहीं है कि हम सिर्फ प्रोडक्ट बेचते हैं, 99 फीसदी सामान हम खरीदते हैं। वास्तव में यह है टैक्सिंग द टैक्सेबल। केंद्र सरकार ने अपने कार्यकाल में जो कार्यशैली दिखाई है वह आर्थिक दृष्टि से पूरे देश के लिए लाभदायक नहीं है। सरकार का विजन ही नहीं समझ में आ रहा है। जीएसटी में सरकार का उद्देश्य है कलेक्शन और सबसे ज्यादा परेशान वह व्यापारी हैं जो कि मैनुअल बिल काट रहे हैं। जिस व्यापारी ने 28 फीसदी पर खरीदा है उसको क्या रिफंड मिलेगा। अब जो जीएसटी का सिस्टम तैयार किया है उसमें इतनी ज्यादा उलझन है कि व्यापारी परेशान हो चुके हैं। सरकार ने क्या पालिसी तैयार की है, इनपुट लेकर आउटपुट का कलेक्शन करते हैं, इनपुट 28 फीसदी देकर क्या करें। अब फोर्स किया जा रहा है कि सी फार्म ले आएं। सीए का इश्यू भी ज्यादा हो रहा है। अब आप देखें कि प्लाईवुड के सेक्टर में कभी टैक्स नहीं था। ऐसा लगता है कि सरकार एमएसएमई को खत्म करना चाहती है।
राकेश गर्ग, महासचिव, पंचकूला इंडस्ट्रियल एसोसिएशन
मैं सर्विस इंडस्ट्री से हूं। कारों का सोल्यूशन उपलब्ध करवाता हूं। इसमें कार वाश, पेंट, रैप और अन्य सर्विसेज आती हैं। हम जो सामान कार वाश या सर्विस के लिए लाते हैं उसमें से ज्यादातर पर हमको 28 फीसदी तक का टैक्स देना होता है। सर्विस देने के कारण हम अपनी सेवाओं में 18 फीसदी का टैक्स ही लेना होता है। ऐसे में सबसे ज्यादा नुकसान हमको होता है। हमको खुद ही टैक्स का बोझ उठाना होता है। पहले हम पांच सौ रुपये लेते थे और अब 590 रुपये। ऐसे में प्रभावित ग्राहक भी हुआ है और हम भी। अब पच्चीस लाख से ज्यादा पर आडिट है, ऐसे में हमारी इंडस्ट्री सीधी प्रभावित हो चुकी है। हमारी पोल्ट्री इंडस्ट्री भी है। जो प्रोटीन आते हैं उसके ऊपर पहले रिबेट थी, अब इसके ऊपर टैक्स लगा दिया गया है। हमारे लिए परेशानी यह है कि हम एक माह में तीन बार यही देखते रहे कि जीएसटी-1, 2 और थ्री कब देना है। वास्तव में समस्याएं सिर्फ इतनी नहीं हैं, एक छोटे उद्यमी के लिए एक स्थायी अकाउंटेंट रखना काफी मुश्किल है। इस समस्या का तभी हल हो सकता है जबकि सरकार रिटर्न का फार्मूला आसान करे।
ऋषभ गुप्ता, उद्यमी (स्टार्टअप)
धीरे-धीरे लागू करना चाहिए था जीएसटी
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जीएसटी रेवेन्यू कलेक्शन के लिए तैयार किया गया था। इसको एकदम से लागू कर दिया गया। एक माडल तैयार किया जाता और उसके बाद उस मॉडल में जो खामियां मिलती उनको इंप्रूव करने के बाद यदि इसे लागू करते तो लाभ होता। छोटे व्यापारी को यह तक नहीं मालूम कि किस प्रोडक्ट पर कितना जीएसटी लगा है। जरूरत यह थी कि इसका प्रोसेस स्लो करना चाहिए था। अभी भी प्रोसेस को धीमा करें तो बेहतर होगा। थोड़ा स्थापित होने के लिए समय तो दें। आरसीएम का उद्देश्य है कि सबको नेट पर लेकर आएं। एचएसएन कोड इसमें सबसे बड़ी बाधा हैं। ट्रांसपोर्टर या गाड़ी सामान लेकर जा रही है और इसके पास इनवायस नहीं है तो परेशानी, इतना ही नहीं, यदि किसी ने इनवायस नहीं डाला तो सामने वाली पार्टी के लिए मुसीबत। वास्तव में जीएसटी का यह फार्मूला सभी के लिए परेशानी भरा बन चुका है। सबसे पहली बात यह है कि इसको आसान किया जाना चाहिए। टैक्स के दरों को कम किया जाना चाहिए। बड़े व्यापारिक घरानों के लिए जीएसटी कोई बड़ी बात नहीं पर छोटे व्यापारी इससे ज्यादा प्रभावित हो चुके हैं।
अशोक गोयल, महासचिव, चैंबर आफ चंडीगढ़ इंडस्ट्रीज
हमारा आयरन स्टील का काम है। जीएसटी लागू होने के पहले हमको अपने ग्राहकों से फार्म सी लेना होता था। हम सभी मैन्युफैक्चरर परेशान थे। जीएसटी लागू होने के इंतजार में बैठे थे। अब इतना ज्यादा उलझाव हो चुका है कि सप्लायर ने जीएसटी नहीं लिया तो नुकसान आपका होगा। आप देखें कि एक छोटी सी राशि पर टैक्स मालूम नहीं पड़ता है लेकिन यदि यही राशि बड़ी हो जाए तो टैक्स हालत खराब देता है। ऐसे में हमारा टैक्स जमा होता जाता है और वापसी का कोई ठिकाना नहीं। इससे व्यापारी का पैसा ब्लाक हो रहा है। जिससे हो यह रहा है कि खर्च बढ़ते चले जा रहे हैं और व्यापारी की पूंजी खत्म। ऐसे में व्यापार को चलाना कुछ समय बाद मुश्किल हो जाएगा। दूसरी बात हम छोटे व्यापारी हैं और हम हरेक तीसरे दिन एकाउंटेंट को नहीं बुला सकते हैं। एमएसएमई वास्तव में छोटे मार्जिन पर काम करता है। क्रेडिट डिपाजिट मिलता नहीं है। अगर मान लीजिए कि सामने वाले ने टैक्स नहीं जमा किया तो हमारा क्या दोष? इसके लिए हम क्यों उत्तरदायी हैं। तीसरी बात यह हैै कि यदि जीएसटी का फार्मूला लाया गया तो इंटरटेनमेंट टैक्स क्यों लगा दिया गया। सरकार एक फार्मूला रखे और टैक्स को आसान बनाएं तो बेहतर होगा।
अमर सिंह नरूला, ज्वाइंट सेकेट्री, चैंबर आफ चंडीगढ़ इंडस्ट्रीज
GST के नफा-नुकसान पर बड़ी बहस
हमारे जैसे छोटे बिजनेसमैन के लिए जीएसटी एक बड़ी मुसीबत बन चुका है। मार्केट में कंपटीशन बढ़ गया है। हमको ग्राहकों को समझाना काफी मुश्किल है कि प्रोडक्ट में टैक्स इतना ज्यादा कैसे लगा दिया गया। मेरे भाई का पैकेजिंग का काम है। उसमें टैक्सेसन डबल हो चुकी है। पचास से साठ लाख रुपये की बिलिंग हो गई और टैक्स चला गया दस लाख से ज्यादा का। ऐसे में कैपिटल को कम हो गई। ऐसे में बिजनेसमैन कैसे सरवाइव कर पाएगा। ऐसे में यदि सरकार क्रेडिट लिमिट बढ़ाए तो अच्छा होगा। वरना बिजनेसमैन के लिए व्यापार में बना रहना काफी मुश्किल है। एक और बात यह है कि टैक्स फाइलिंग के लिए मंथली समय को बढ़ाकर रिवाइज किया जाना चाहिए। हमारे लिए मुश्किल यह है कि हम अपने व्यापार को देखें कि सेल, परचेज और रिटर्न फाइल पर ही ध्यान देते रहें। हमारा व्यापार इतना बड़ा नहीं है कि एकाउंटेंट को लगातार बुलाएं। इसके लिए हमको ज्यादा खर्च करना पड़ेगा।
प्रदीप चोपड़ा, उद्यमी (कंप्यूटर हार्डवेयर)
कुछ समय पहले की बात है कि हमसे किसी ने एसी खरीदा और नौ हजार रुपये टैक्स देखकर मेरा चेहरा देखने लगा। फिर बोला कि आधा-आधा कर लेते हैं। वास्तव में हमारे लिए ग्राहकों को समझाना काफी मुश्किल हो गया है। मैं हास्पिटलिटी और इलेक्ट्रानिक्स इंडस्ट्री से हूं। लिकर पर पहले छह फीसदी टैक्स था और अब 12 फीसदी हो गया है। ऐसी स्थिति में कास्ट बढ़ गई और सेल कम हो गई। इन सभी परिस्थितियों में हमारी कमाई कम हो चुकी है। हमको ग्राहक को समझाना काफी मुश्किल हो चुका है। तीन रिटर्न काफी मुश्किल भरी चुनौती हैैं। इसका इंपैक्ट मार्के ट में दिखाई देने लगा है। इससे दो नंबर का धंधा भी बढ़ने के आसार हैं। कुछ भाइयों ने कहा कि दो नंबरल का काम बढ़ जाएगा। जीएसटी का काम खत्म हो जाएगा। चंडीगढ़ में जीएसटी की वजह से त्यौहार के पहले महंगाई बढ़ चुकी है और व्यापारियों की सेल आधी हो चुकी है।
बलजिंदर बिट्टू, उद्यमी और चेयरमैन फासवेक