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दिल्ली में शिअद-भाजपा में दरार से सुखबीर बादल का सपना 'मिशन 2022' खतरे में, टूट सकता है

Wed, 22 Jan 2020 10:42 AM IST
खुशबू गोयल अशोक नीर, अमर उजाला, अमृतसर(पंजाब)
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Sukhbir Badal
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दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के साथ समझौता टूटना शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर बादल के 'मिशन 2022' के सपने पर एक बड़ा राजनीतिक प्रहार है।
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सांसद सुखदेव सिंह ढींढसा व उनके बेटे विधायक परमिंदर सिंह ढींढसा के शिअद (बादल) की राजनीतिक बस से उतरने के बाद प्रदेश की सिख सियासत में आए नए सियासी भूचाल के थपेड़ों को सुखबीर बादल अभी झेल ही रहे थे कि दिल्ली चुनाव में भाजपा ने उनके साथ कोई भी समझौता न करने के स्पष्ट संकेत दे दिए।

ऐसे में इसका प्रभाव 2022 चुनाव पर पड़ सकता है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में अकाली दल के साथ समझौता न करने का फैसला पंजाब में सिख राजनीति के बदल रहे समीकरणों का अध्ययन करने के बाद ही लिया है।
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एक हो गए बादल परिवार विरोधी दल और लोग

लोकसभा चुनाव से पहले पूर्व सांसद जत्थेदार रंजीत सिंह ब्रह्मपुरा, डॉ. रतन सिंह अजनाला और सेवा सिंह सेखवां जैसे टकसाली अकाली नेताओं सुखबीर बादल के विरुद्ध बगावत की थी। इसके बाद ढींढसा परिवार द्वारा सुखबीर की कार्यप्रणाली को पंथक कटघरे में खड़ा करने के लिए छेड़े गए अभियान का प्रभाव प्रदेश की सिख राजनीति पर पड़ता दिख रहा है।

सुखबीर जहां प्रदेश में पार्टी को एकजुट रखने में असफल रहे हैं, वही दिल्ली में भी शिअद में बिखराव पैदा हुआ। दिल्ली कमेटी के अध्यक्ष पद पर पांच वर्ष तक रहने वाले मंजीत सिंह जीके व वर्तमान अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा के बीच पार्टी बंट गई।

मंजीत सिंह जीके ने दिल्ली की सिख राजनीति में बादल परिवार के वर्चस्व को कमजोर करने के लिए 18 जनवरी को सफर-ए-अकाली लहर का आयोजन किया था। इस कार्यक्रम में बादल परिवार विरोधी सभी अकाली नेताओं के साथ-साथ ढींढसा परिवार और शिअद (टकसाली) के नेताओं ने हिस्सा लिया।
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दिल्ली में कुछ ऐसे कमजोर पड़ी बादल परिवार की पड़क

दिल्ली की सिख सियासत में बादल परिवार की पकड़ कमजोर होने के बाद भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में सिख मतों के लिए अकाली दल की निर्भरता को पूरी तरह नकार दिया है। सुखबीर ने हरियाणा विधानसभा चुनाव में न केवल भाजपा के विरुद्ध चुनाव प्रचार किया, बल्कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल की कार्यप्रणाली पर कटाक्ष भी किए।

हालांकि इसके बावजूद सुखबीर बादल अपना कोई उम्मीदवार चुनाव में नहीं जिता सके थे। दिल्ली दंगों के दोषी कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को सजा दिलाकर मोदी सरकार ने सिखों के जख्मों पर मरहम लगाई। विदेशों में बैठे कई सिखों के नाम काली सूची से हटाए गए।

कुछ दिन पहले जस्टिस ढींगरा द्वारा दिल्ली दंगों में शामिल पुलिस अधिकारियों को कटघरे में खड़ा करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पुलिस की भूमिका की जांच के दिए आदेश से भाजपा को उम्मीद है कि दिल्ली के सिखों के वोट उन्हें मिलेंगे। मोदी सरकार द्वारा गुरुद्वारा करतारपुर साहिब के कॉरिडोर का निर्माण कर सिखों के दिलों को जीतने का भी प्रयास किया है।
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