हरियाणा में किसान आंदोलन के जरिए अन्नदाताओं ने ये बता दिया है कि वे कृषि बिलों को जल्दी अपनाने के मूड में नहीं है। कृषि बिलों के संदर्भ में भय और भ्रम का ऐसा जाल उनके इर्द-गिर्द बना हुआ है। जिससे पार पाना अभी आसान नहीं दिख रहा है, क्योंकि विपक्षी दल भी किसानों के इस आंदोलन की आंच में अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में पीछे नहीं हैं। किसान आंदोलन की अगुवाई भले ही किसान नेता ही कर रहे हों।
मगर इस वक्त ज्वलंत बन चुके इस मुद्दे को भुनाने में विपक्षी दलों में जो होड़ लगी है। उससे यह भी स्पष्ट है कि विरोधी दल भी आंदोलन की इस चिंगारी को अभी और हवा देने की मंशा रखते हैं। नतीजतन इस तरह किसान वर्ग का भय और भ्रम के जंजाल से बाहर आना सहज नहीं हो पाएगा। शुक्रवार को हरियाणा में हुए किसानों के बंद आंदोलन को भी सभी विपक्षी सियासी दलों का अपनी ओर से खुला समर्थन रहा।
हालांकि कई जगह किसान नेताओं को यह भी कहते सुना गया कि ये उनकी लड़ाई हैं, इसमें सियासत नहीं चाहिए। कुछेक जगह सियासी नेताओं को किसान नेताओं ने संबोधन के लिए माइक तक नहीं दिया। मगर बावजूद इसके विरोधी सियासी दल अपने स्तर पर कृषि बिलों के खिलाफ झंडा बुलंद किए हुए हैं।
किसानों में भरोसे की अलख जगाने में जुटी सरकार
दूसरी ओर, किसानों को घेरने वाले भय और भ्रम के इस माहौल के बीच हरियाणा सरकार ने ‘भरोसे’ को अपनी ढाल बनाया है। सूबे के मुख्यमंत्री मनोहर लाल समेत उनकी मंत्रियों और विधायकों की टीम, सोशल मीडिया टीम हर प्लेटफॉर्म और फील्ड में किसानों को बार-बार ये भरोसा दिला रही है कि कृषि कानूनों में जो बदलाव हुए हैं, वे उनके लिए एक ‘दूसरे विकल्प’ जैसा है।
इन बिलों से न तो मंडियां बंद होने वाली हैं और न ही मंडियों में एमएसपी से कम कोई फसल बिकने वाली है। इसके जरिये अब किसान चाहें तो मंडियों में अपनी फसल बेचे या बाहर खुद कारोबारी बनकर अपनी कीमत पर प्राइवेट टेडर्स से फसल व्यापार करे। टीम मनोहर इस संदर्भ में जागरूकता फैलाने के साथ-साथ किसानों को भड़काना विपक्ष और कुछ कथित किसान नेताओं की साजिश बता रही है।
प्रदेश सरकार का मानना है कि कृषि कानूनों में ये बदलाव किसानों की आय बढ़ाने में बड़े सहायक बनेंगे। किसान अपनी किसानी उद्यमी बनकर करेंगे। अपनी फसलों का खुद रेट लगाएंगे और देशभर में अपने ग्राहक खुद ढूंढकर मनमाने दाम पर फसल भी बेच सकेंगे।
खरीफ फसलों की खरीद का समय भी नजदीक
उधर, खरीफ फसलों की खरीद का समय भी नजदीक आ रहा है। ऐसे में सरकार को मंडियों में खरीद व्यवस्था को ऐसा बनाना होगा। जिससे सरकार किसानों को भरोसा दिलवा सके कि वाकई सरकार किसानों की हितैषी है और उनका हित ही उनके लिए सर्वोपरि है। किसानों के लिए यही भरोसा दिलवाना एक अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।
आंदोलन के साथ अपनों का दबाव भी
किसानों आंदोलनों से अलग इसी मुद्दे को लेकर सरकार पर ‘अपनों’ का भी पूरा दबाव है। एक ओर किसान और विपक्षी दलों से सरकार जूझ रही है। वहीं दूसरी ओर, भाजपा से जुड़े कुछ पूर्व विधायक नेता सरकार पर दबाव डाल रहे हैं। इन नेताओं का कहना है कि किसान होने के नाते वे किसानों के साथ खड़े हैं।
इसलिए वे प्रदेश सरकार से मांग कर रहे हैं कि सूबे की सरकार के पास ऐसी शक्तियां हैं, जिसका इस्तेमाल कर वे किसानों के अधिकारों को संरक्षित करने संबंधी कानून बना सकती है और प्रदेश सरकार को किसानों के लिए ऐसा कानून बनाना चाहिए।