पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पथराव करने वाली भीड़ के साथ पंजाब पुलिस के एक हेड कांस्टेबल की ओर से समझौता कर लिए जाने और उसी समझौते के आधार पर हाईकोर्ट में एफआईआर रद कराने पहुंचे याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपये का जुर्माना तो लगाया ही, पंजाब सरकार से संबंधित हेड कांस्टेबल को हटाने के आदेश भी दिए।
जस्टिस राजन गुप्ता की कोर्ट में आए इस मामले में याचिकाकर्ता हरनेक सिंह व अन्य ने मोहाली के फेस-8 थाने में उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को यह कहते हुए खारिज करने की मांग की कि इस मामले में उनका शिकायतकर्ता हेड कांस्टेबल जगत सिंह के साथ राजीनामा हो गया है। इस याचिका का विरोध करते हुए पंजाब सरकार ने कहा कि हेड कांस्टेबल स्तर के किसी कर्मचारी को राज्य से जुड़े मामले में कोई फैसला लेने का अधिकार नहीं है।
मामला कुछ साल पहले मोहाली के पीसीए स्टेडियम में क्रिकेट मैच के दौरान पंजाब के ग्रामीण वेटरेनरी फार्मासिस्ट और ग्रामीण हेल्थ फार्मासिस्ट एसोसिएशन के 200 सदस्यों द्वारा किए गए धरना-प्रदर्शन का है। मोहाली के डीएसपी सिटी-2 वरिंदरजीत सिंह की ओर से उक्त याचिका के खिलाफ कोर्ट में दायर किए हलफनामे में बताया गया कि धरने दे रहे फार्मासिस्ट पुलिस से उलझ गए और उन्होंने पथराव शुरू कर दिया। इसमें पुलिस कर्मचारियों के साथ कई लोगों को चोटें आईं।
मोहाली फेस-8 थाना पुलिस ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत प्रदर्शनकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली। यह एफआईआर पथराव में घायल हुए हेड कांस्टेबल जगत सिंह की शिकायत के आधार पर दर्ज की गई थी। जगत सिंह व कई अन्य पुलिस वालों को मोहाली के सिविल अस्पताल में भरती कराया गया।
इसी एफआईआर को रद कराने पहुंचे याचिकाकर्ता ने कहा कि उनके द्वारा माफी मांग लिए जाने के बाद हेड कांस्टेबल जगत सिंह के साथ उनका समझौता हो गया है। याचिका में कहा गया कि हेड कांस्टेबल जगत सिंह को एफआईआर रद करने पर कोई आपत्ति नहीं है। डीएसपी वरिंदरजीत सिंह द्वारा दायर हलफनामे में इस समझौते का विरोध करते हुए कहा गया कि यह मामला राज्य और जनता की सुरक्षा से जुड़ा है। ऐसे मामले में कोई हेड कांस्टेबल बिना उच्चाधिकारियों की राय के कोई फैसला नहीं ले सकता।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता के बीच यह समझौता हैरतअंगेज है। एक भीड़ जिस पर कई अपराध बनते हैं, केवल एक हेड कांस्टेबल की अनापत्ति के सहारे आरोपमुक्त होना चाहती है। जस्टिस राजन गुप्ता ने कहा कि इस मामले में कुछ अतिरिक्त विचारों से इंकार नहीं किया जा सकता।
स तरह के अपराध पर राज्य को फैसला लेना चाहिए न कि शिकायतकर्ता द्वारा। फिर भी, शिकायतकर्ता पूरी भीड़ व उसके जबरदस्त एक्शन के साथ समझौता करता है और उच्चाधिकारियों को इस बात की जानकारी भी नहीं होती। अगर ऐसे पुलिस अधिकारी सेवा में लगातार बने रहे तो न तो कानून-व्यवस्था बनी रह सकेगी और न ही कोई जांच किसी नतीजे तक पहुंच सकेगी।