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केवल एडल्टस ने ही देखा, जात ही पूछो साधू की’

Mon, 21 Apr 2014 12:38 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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एक अनुभवी कलाकार कई किरदारों में जान डाल देता है, लेकिन एक नया कलाकार किरदार में नवीनता लेकर आता है। कुछ ऐसी ही ताजगी नजर आई रविवार शाम पंजाब कला भवन में मध्य प्रदेश स्कूल ऑफ ड्रामा द्वारा नाटक ‘जात ही पूछो साधू की’ के मंचन में।
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नाटक को शहर के नए कलाकार आत्म प्रकाश मिश्रा ने निर्देशित किया। क्योंकि नाटक विजय तेंदुलकर का लिखा हुआ था तो स्वाभाविक था उसमें वयस्कों से संबंधित भाषा का प्रयोग हो, इसलिए नाटक को केवल वयस्कों के लिए ही रखा गया था।

नाकाम रही नौकरी बचाने की जुगत
नाटक की कहानी शुरू होती है भोजपुरी गायन से, जो नाटक के मुख्य किरदार महिपत की जिंदगी के बारे में बताते हैं। महिपत जो कि छोटी जात से है। मंच पर रोशनी होती है और पतले शरीर वाला, लेकिन भाव भरे चेहरा लिए युवक सामने आता है और अपनी जिंदगी के बारे में बताता है।
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वह एमए पास होने पर खुश है तो वहीं छोटी जात का होने के कारण हर जगह से नौकरी के लिए इन्कार किए जाने पर हताश भी है। नाटक तब रोचक होता है जब महिपत को एक ऐसे कालेज में नौकरी मिलती है जहां का चेयरमैन अनपढ़ है। वह महिपत को कालेज में हिंदी के प्रोफेसर के रूप में नियुक्त कर देता है।

महिपत का कालेज में पहला दिन और उसका पाला पड़ता है चेयरमैन के बेटे से। जो दबंग होने के साथ ही खूब शैतानियां भी करता है। महिपाल उसे डांट कर सीधा रखना चाहता है, लेकिन उसे यह भी पता है कि चेयरमैन को भी वह नाराज नहीं कर सकता। महिपत भी चेयरमैन के बेटे और कालेज के अन्य बच्चों के साथ उन्हीं के रंग में रंग जाता है।

तभी एक दिन उसे खबर मिलती है कि चेयरमैन की भतीजी नली जिसे पढ़ना लिखना नहीं आता उसे असिस्ट करेगी। महिपत समझ जाता है कि उसे नौकरी से हटाने और नली को नया प्रोफेसर नियुक्त करने की साजिश रची जा रही है। महिपत नली से बचने के लिए उससे प्यार का ड्रामा करता है, जिसमें नली आ जाती है और उसे कई प्रेम भरे खत लिखती है। इसके बाद कालेज में उनके प्यार के चर्चे हो जाते हैं।

नली एक दिन महिपत से कहती है कि वह उससे शादी करना चाहती है। समय के साथ महिपत भी नली से प्यार करने लगता है। जैसे ही यह बात चेयरमैन तक पहुंचती है तो वह गुस्सा हो जाता है।

वह महिपत से कहता है कि वह नली की लिखी सारी चिट्ठियां वापस करें, नली भी अंत में महिपत का साथ छोड़ देती है और महिपत को गांव और नौकरी छोड़कर जाना पड़ता है।

पर्दे के पीछे
नाटक के दौरान लाइट्स का प्रयोग शानदार तरीके से किया गया। नाटक की रिहर्सल में की गई मेहनत साफ दिखती है। वहीं नाटक के निर्देशन की बात करें तो आत्म प्रकाश मिश्रा को अच्छी टीम मिली। टीम ने हर सीन में काफी मेहनत की जो मंच पर दिखी भी। नाटक में सरवर अली ने दमदार अभिनय किया।

चेयरमैन के किरदार को उन्होंने बखूबी निभाया। उनका रौब और अपशब्दों को कुछ इस कदर डायलॉग में शामिल किया कि वह कही से भी थोपा हुआ नहीं लगता। कुल मिलाकर नाटक को युवाओं का एक बेहतर प्रयास कह सकते हैं, जिसे देखने के लिए लोग अंत तक सीट से चिपके रहे।

नाटक देखने वालों की राय

नाटक देखकर मजा आया। नाटक की लेखनी जरूर पुरानी है, लेकिन इसमें दिखाए दृश्य काफी बेहतर हैं। नाटक में कई हास्य के पल हैं, जिसमें इसकी अवधि ज्यादा नहीं लगती। सभी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है।
- सुखप्रीत सिंह, थिएटर कलाकार

अगर आप चंडीगढ़ में नाटक देखें तो कई कमियां दिखती हैं, लेकिन इस नाटक में कमियां कम और बहुत सी नई चीजें थी। जैसे कि एक्टिंग में नयापन, किरदार बेशक पुराने हो चुके हैं, लेकिन अदाकारी के दम पर इसमें रोचकता बनी रही। नाटक अच्छा था और खूब रहा।
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-रश्मिंदर सिंह, प्राइवेट कर्मचारी और थिएटर कलाकार
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