अफसरों की लेटलतीफी सिर्फ आम लोगों के कामकाज में ही नहीं दिखती, बल्कि मासूमों को मां की ममता दिलाने में भी यह हावी है। सेक्टर-15 स्थित शिशु गृह में करीब 48 बच्चे हैं, जिनका लालन-पालन तो हो रहा है, लेकिन उन्हें गोद लेने की प्रक्रियाओं में जो कागजी कार्रवाई की जाती है, उनमें अफसरों की लेटलतीफी की वजह से महीनों तक अड़ंगा लगा रहता है। लापरवाही तो अफसरों की है, लेकिन मां की आंचल, लोरियां और हाथों की थपकियों के लिए बच्चों को ही तरसना पड़ता है।
पिछले साल वर्ष-2013 में मात्र दो बच्चों के गोद देने के लिए जिला बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) से क्लीयरेंस सर्टिफिकेट मांगा गया था। इसका सबसे बड़ा कारण है बच्चों के गोदनामे की प्रक्रिया समय से पूरी नहीं होना और इससे संबंधित कागजात सीडब्ल्यूसी को नहीं भेजा जाना। इसके अलावा पुलिस विभाग की तरफ से भी बच्चों की रिपोर्ट समय पर नहीं सौंपी जाती है।
सूचना तक ही सीमित है बाल कल्याण समिति
शिशु गृह आने वाले बच्चों की मात्र सूचना ही जिला बाल कल्याण समिति को दी जाती है कि बच्चे शिशु गृह में आ गए हैं। बच्चों से संबंधित किसी तरह की डिटेल्स सीडब्ल्यूसी को नहीं भेजी जाती है।
नियम के अनुसार, बच्चों के शिशु गृह में आने के बाद मेडिकल सर्टिफिकेट, सोशल इनवेस्टिगेशन रिपोर्ट, एफआईआर/डीडीआर की कॉपी और गोदनामे से संबंधित डिटेल्स देनी चाहिए, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पात है।
पुलिस समय पर नहीं सौंपती रिपोर्ट
बाल कल्याण समिति को लावारिस बच्चों की रिपोर्ट पुलिस समय से नहीं सौंपती हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कालका में 26 जनवरी को मिली बच्ची। उसकी रिपोर्ट पुलिस ने अभी तक बाल कल्याण समिति को नहीं सौंपी है।
नियम के अनुसार 90 दिनों के भीतर पुलिस को रिपोर्ट बाल कल्याण समिति को सौंप देनी चाहिए। इस बच्ची के मामले में भी 90 दिन पूरे होने वाले हैं, लेकिन अब तक समिति को रिपोर्ट नहीं भेजी गई है। बच्ची अब भी शिशु गृह में है। गोदनामे में विलंब का इसे भी प्रमुख कारण माना जा रहा है।
यह है नियम
किशोर न्याय कानून (बच्चों की देखरेख और संरक्षण)अधिनियम 2000 के अंतर्गत शिशु गृह में रहने वाले हर बच्चे का विवरण और उनके मामले में की गई कार्रवाई के डाक्यूमेंट के साथ जिला बाल कल्याण समिति को सूचित किया जाना चाहिए।
बाल कल्याण समिति का काम
किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम 2006 के तहत जरूरतमंद बच्चों की देखरेख, संरक्षण, उपचार, विकास, पुनर्वास के मामलों के निपटारे के लिए बाल कल्याण समिति अंतिम प्राधिकारी है।
शिशु गृह में रहने वाले बच्चों के आने की सूचना के अलावा कोई डाक्यूमेंट नहीं दिया जाता है। पुलिस विभाग की तरफ से समय से बच्चों से जुड़ी रिपोर्ट नहीं साैंपी जाती हैं। इस वजह से बच्चों के गोदनामे में विलंब होता है।
शिशु गृह से एक साल में मात्र दो बच्चों का एडाप्शन क्लीयरेंस सर्टिफिकेट मांगा गया है। कालका में मिली बच्ची की रिपोर्ट अब तक नहीं दी गई है।
- देवेंद्र कुमार, चेयरपर्सन, बाल कल्याण समिति, पंचकूला