चंडीगढ़। ‘महिलाओं पर होने वाले तेजाब से हमले के पीछे समाज की पितृसत्तात्मक सोच और एकतरफा प्यार बड़ा कारण हैं। यही नहीं, महिलाओं को ही इसके लिए कसूरवार ठहराने की कोशिश तक की जाती है।’
2005 में एसिड अटैक का शिकार हुई लक्ष्मी अग्रवाल ने ये बातें चंडीगढ़ में मंगलवार को मीडिया से कहीं। वह प्रेस क्लब में एक किताब के विमोचन के सिलसिले में पहुंची थीं। लक्ष्मी ने कहा कि इस तरह के ज्यादातर केस में यही देखने को मिलता है कि लड़की ने न क्यों कहा, इसी का बदला लेने की कोशिश की होती है। उन्होंने हैरानी जताई कि आज भी हम दुकान पर आसानी से तेजाब खरीद सकते हैं, कोई नहीं पूछता कि यह किसलिए चाहिए। देश के हर राज्य के जिलों से लेकर गांवों तक में तेजाब बिक रहा है। इसे रोकने में प्रशासन असमर्थ रहा है।
पंजाब यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता और वकील डॉ. नवप्रीत कौर ने अपनी किताब में तेजाब के हमलों की पीड़ित महिलाओं के दर्द को बयां किया है। मंगलवार को उन्होंने सेक्टर-27 स्थित प्रेस क्लब में किताब का विमोचन लक्ष्मी अग्रवाल से कराया। नवप्रीत ने बताया कि हमारे देश में 35 प्रतिशत तेजाब हमले के मामले दर्ज ही नहीं होते हैं। इसका कारण हमारे समाज की पितृसत्तात्मक सोच, शादीशुदा केसों में शादी को बचाए रखने का सामाजिक दबाव, महिलाओं का जागरूक और स्वनिर्भर नहीं होना इत्यादि है।
डॉ. नवप्रीत ने बताया कि शोध में मिला कि पश्चिम बंगाल में तेजाब से हमले के मामले सबसे अधिक हैं। मैंने लगभग 200 पीड़ित महिलाओं से बातचीत की। इसमें लगभग 35 प्रतिशत केस दर्ज ही नहीं थे, क्योंकि उनके परिजन नहीं चाहते थे कि समाज में उनके घर की महिला के बारे में बातचीत हो।
आगरा में पति ने पत्नी और बेटी पर तेजाब फेंक दिया था। पत्नी को लगातार बेटी ही पैदा हो रही थी, इसलिए पति को यह स्वीकार नहीं हुआ। शोध में सामने आया कि दिल्ली, उत्तर प्रदेश, केरल और पंजाब में तेजाबी हमले की घटनाएं ज्यादा हो रही हैं। इनमें 15 से 35 उम्र वर्ग की महिलाएं ज्यादा हैं। 2013 तक हमारे देश में तेजाबी हमलों का डाटा ही नहीं था। इसके बाद कानून में संशोधन कर आईपीसी की धारा-326ए और 326बी को जोड़ा गया और इसमें ज्यादा सजा का प्रावधान किया गया।
पीयू ने एक वर्ष तक शोध के विषय को नहीं दी थी अनुमति
डॉ. नवप्रीत ने बताया पीयू कानून विभाग की प्रो. डॉ. जयमाला मेरी गाइड थीं। वह भी महिलाओं के मुद्दों पर काम कर रही थीं। 2014 में मैंने शोध शुरू किया। उस दौरान हमने महिलाओं पर तेजाबी हमले के विषय को चुना तो पीयू ने मेरा टॉपिक ही रद्द कर दिया था। उनका पक्ष था कि इस पर अभी तक न ज्यादा शोध है और न ही कोई लिखित दस्तावेज। इनके बिना शोध कार्य नहीं पूरा होगा, आप इस विषय पर सिर्फ लेख लिख सकती हैं। लगभग एक साल की जद्दोजहद के बाद हमारे शोध विषय को पीयू से अनुमति मिल पाई थी।