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पंथक राजनीति: पंजाब की पंथक सियासत की उठापटक में खामोश रह अवसर तलाश रहीं आप और भाजपा, अहम होगा ये खास वोट बैंक

Tue, 11 Mar 2025 09:50 AM IST
शाहरुख खान विशाल पाठक, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

पंजाब की पंथक सियासत की उठापटक में आप और भाजपा खामोश रह अवसर तलाश रहीं हैं। 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव में पंथक वोट बैंक अहम होगा। बदले घटनाक्रम में गतिविधियां तेज हो गई हैं।
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punjab politics - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पंजाब की पंथक सियासत में उठापटक के बीच बड़े फेरबदल सामने आ रहे हैं। ज्ञानी हरप्रीत सिंह, रघबीर सिंह और ज्ञानी सुलतान सिंह को पद से हटाए जाने के बाद जिस कदर आनन फानन सोमवार सुबह श्री केसगढ़ साहिब में ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज की दस्तारबंदी हुई, उससे सिख कौम और पंथक राजनीतिक नई दिशा की ओर करवट लेती नजर आ रही है।
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पंथक पार्टी और क्षेत्रीय दल का टैग लगाने वाला शिरोमणि अकाली दल पंथक सियासत के निशाने पर है। इन सबके बीच प्रदेश की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप) और भाजपा की इस पूरे प्रकरण में खामोशी नए अवसर की तलाश में है। 



पंथ और शिअद के बीच बढ़ते तनाव पर जहां सभी दल सिख कौम और पंथक नुमाइंदों के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। वहीं, आप की खामोशी जहां 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए इस प्रकरण को अपने अवसर के रूप में तलाश रही है। 
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वहीं, भाजपा की खामोशी हिंदू, दलितों, पिछड़ों और बदलाव की चाह रखने वाले वोट बैंक पर नजर गड़ाए हुए हैं। आप जहां पर्दे के पीछे से ही पंथक राजनीतिक को काफी सूझबूझ के साथ आंक रही है। 

पंजाब विधानसभा चुनाव में अकेले ही मैदान पर उतरेगी भाजपा
वहीं, शिअद से गठबंधन टूटने के बाद वह अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी है। भाजपा के दिल्ली के कैबिनेट मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा भी दावा कर चुके हैं कि 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव में पंजाब भाजपा अकेले ही मैदान पर उतरेगी। 

 

भाजपा पंथक राजनीति में बिना दखल दिए सियासी किनारे के जरिये अब पंजाब की सियासत में अपने सिख चेहरों को प्रमुख रूप से पेश कर रही है, जो प्रदेश की सियासत में अलग-अलग सरकारों में अहम भूमिका निभा चुके हैं। 

2027 के विस चुनाव में दिखेगा पंथक सियासत की उठापटक का असर
चाहें फिर बात दिल्ली के कैबिनेट मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा की हो, केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू की हो या फिर अन्य लीडरशिप की हो। यह बात तो तय है कि पंथक सियासत की उठापटक का बड़ा असर 2027 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिलेगा।

बंटने के कगार पर बादल का सियासी कुनबा 
ज्ञानी रघबीर सिंह और सुलतान सिंह को पद से हटाए जाने के अंतरिम कमेटी के फैसले से असंतुष्ट अकाली दल के नेता बिक्रम सिंह मजीठिया के खुलकर सामने आने के बाद अब बादल का सियासी कुनबा भी बंटने और बिखरने के कगार पर है।

पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष बलविंदर सिंह भूंदड़ ने अंतरिम कमेटी के फैसले से असंतुष्ट मजीठिया और उनके खेमे के अन्य नेताओं को शोकॉज नोटिस जारी कर जिस कदर जवाब तलब किया है, उससे स्पष्ट है कि जल्द ही बादल के सियासी कुनबे में दरार आनी तय है।

अकाली दल की अनुशासनात्मक कमेटी ने मजीठिया और उनके समर्थकों से लिखित जवाब तलब किया है, इससे स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में अकाली दल की सियासत में मजीठिया और सुखबीर बादल के खेमे आपस में उलझते नजर आएंगे। इस पूरे प्रकरण पर अब शिअद के बागी गुट सुधार लहर ने भी नजरें गड़ाई हुई हैं।

जीठिया के साथ खड़ा दिखाई देगा सुधार लहर
मजीठिया और सुखबीर के सियासी कुनबे के बंटवारे की बात सामने आई तो सुधार लहर मजीठिया के साथ खड़ा नजर आएगा। इसके पीछे का एक ही कारण है कि किसी भी तरह अकाली दल की बागडोर पूरी तरह सुखबीर के हाथों से ले ली जाए, जिस कारण से सुधार लहर का जन्म हुआ।

चित्त भी आप की पट भी आप का
शिअद और पंथ के बीच बढ़ती दूरियां आप के लिए किसी अवसर से कम नहीं। इसके जरिये आप को पंथक सियासत के करीब जाने और भरोसा जीतने का बड़ा अवसर मिला है। प्रदेश की राजनीति में पंथक सियासत बेहद ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि जिस कदर अकाली दल को अब पंथक सियासत की नाराजगी का सामना करना पड़ा है और उसका ग्राफ गिरता चला गया है, इससे स्पष्ट है कि आप के 2027 में कमबैक के लिए यह बड़ा आधार बन सकता है।

प्रदेश की हर पार्टी पंथक स्पोर्ट की तलाश में रही है। यही कारण है कि आप की खामोशी उन्हें पंथक राजनीति के करीब ले जाती नजर आ रही है। कांग्रेस और भाजपा की भी पंथक हमदर्दी यही बयान करती नजर आ रही है।

कट्टरवादियों का भी पंथक हितैषी एजेंडा
सियासी जानकारों की मानें तो पंजाब की सियासत में असम की डिब्रूगढ़ जेल में बंद सांसद अमृतपाल सिंह, फरीदकोट से सांसद सर्बजीत सिंह खालसा जैसे कट्टरवादी सोच रखने वाले चेहरे भी अब पंथक सियासत में पांव जमाते नजर आ रहे हैं।
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वह भी पंथक हितैषी के एजेंडा पर चलते हुए प्रदेश की सियासत में नया अध्याय लिखने की चाह से आगे बढ़ रहे है। यही कारण है कि पंथक उलझनें शिअद या अन्य किसी भी दल के लिए 2027 में बड़ी मुसीबत बनकर उभर सकती हैं।
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