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Chandigarh News: रासायनिक उर्वरक के इस्तेमाल से उपज में 84 फीसद की आई कमी

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- हरियाणा में अंधाधुंध बढ़ रहा रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग
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- 1 लाख 50 हजार मीट्रिक टन यूरिया और 50 हजार मीट्रिक टन डीएपी की इस बार अधिक मांग
-5 लाख मीट्रिक टन खाद की बिक्री हो चुकी है प्रदेश में अब तक
-4.31 लाख मीट्रिक टन खाद है विभाग के स्टॉक में


अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। ज्यादा फसल की पैदावार करने की होड़ के चलते हरियाणा में रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। प्रदेश में पिछले 5 वर्षों से रासायनिक खाद का प्रयोग औसतन 210.10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रहा है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार महज 30 प्रतिशत रासायनिक उर्वरक फसल के लिए उपयोगी होता है। बाकी मिट्टी की कुदरती उर्वरता को तेजी से नष्ट करते हैं। हरित क्रांति के शुरुआती सालों में 1 किलोग्राम रासायनिक उर्वरक के इस्तेमाल से 50 किलोग्राम उपज होती थी, जो अब घटकर 8 किलोग्राम रह गई है। यानि उपज में 84 फीसद की कमी आई है।
हरियाणा में पिछले पांच साल पहले की बात करें तो रबी और खरीफ के सीजन में औसतन 8 लाख मीट्रिक टन खाद की खपत होती थी। लेकिन अब लगातार खाद की मांग और खपत बढ़ती जा रही है। खासकर यमुनानगर, सिरसा, फतेहाबाद, महेंद्रगढ़, हिसार और भिवानी में खाद की मांग तेजी से बढ़ रही है। इस बार बढ़ती मांग के चलते हरियाणा ने एक लाख मीट्रिक टन यूरिया और 50 हजार मीट्रिक की अधिक मांग की है। प्रदेश में अब तक 5 लाख मीट्रिक टन खाद की बिक्री हो चुकी है, जबकि विभाग के स्टॉक में 4.31 लाख मीट्रिक टन खाद है।
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साल खपत (किलोग्राम प्रति हेक्टेयर)
2021-22 210.10

2020-21 216.78

2019-20 210.87

2019-19 217.72

2017-18 210.07

खाद यूरिया खपत (लाख मीट्रिक टन)
2018 8.11
2019 9.32
2020 10.09
2021 10.51
2022 10.81
2023 11.50


हरियाणा में खाद की जरूरत
खाद मांग (मीट्रिक टन)
यूरिया 10
डीएपी 3
एसएसपी 0.95
एनपीके 0.20
कुल 14.15

मिलावटी खाद भी बढ़ा रहे परेशानी

केवल अधिक रासायनिक खादों के प्रयोग से ही नहीं, नकली खाद भी जमीनों की उर्वरक शक्ति को खराब कर रहे हैं। पिछले छह साल में हरियाणा में उर्वरकों, बीज और कीटनाशकों के कुल 1006 सैंपल फेल पाए गए हैं। ये मानकों पर खरे नहीं उतरे। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 से लेकर अब तक कुल 38932 सैंपल लिए गए।
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कोट
हरियाणा में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए देसी गाय की खरीद पर 25 हजार रुपये तक की सब्सिडी व प्राकृतिक खेती के लिए जीवामृत का घोल तैयार करने के लिए चार बड़े ड्रमों के लिए हर किसान को 3 हजार रुपये दिए जा रहे हैं। किसानों को प्रशिक्षित करने को 2 प्रशिक्षण केंद्रों गुरुकुल, कुरुक्षेत्र और घरौंडा, करनाल में प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। इसके अलावा, जल्द ही तीन स्थानों चौधरी चरण सिंंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार, हमेटी, जींद तथा मंगियाणा, सिरसा में 3 और प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए जाएंगे।
-डाॅ. नरहरि सिंह बांगड़, महानिदेशक, कृषि विभाग।
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