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सबसे कम उम्र का डायबिटीज मरीज आया सामने

Wed, 12 Nov 2014 01:42 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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छोटे बच्चों में टाइप-वन डायबिटीज गंभीर समस्या बनती जा रही है। पीजीआई के इंडोक्रिनोलॉजी डिपार्टमेंट का दावा है कि उनके पास सबसे छोटी उम्र का मरीज आया है। मात्र आठ माह का मासूम डायबिटीज से पीड़ित अब आठ साल का हो चुका है।
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पीजीआई के इंडोक्रिनोलॉजी डिपार्टमेंट के एचओडी डॉ. अनिल भंसाली और डॉ. संजय बडाडा ने बताया कि अब इस बच्चे को पूरी जिंदगी भर बाहर से इंसुलिन देनी पड़ेगी। एक बच्चे को दिन में कम से कम चार बार इंसुलिन के डोज दिए जाते हैं, जो बहुत ही पीड़ादायक होते हैं। इससे बच्चा ही नहीं बल्कि पूरा परिवार डिस्टर्ब हो जाता है।

यदि इंसुलिन नहीं मिलती है तो दूसरी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं। उन्होंने बताया कि अब बच्चा बड़ा हो गया है, लेकिन मुश्किलें जस की तस हैं। उनके क्लीनिक में डायबिटीज पीड़ित बच्चों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
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हालांकि अब तक टाइप वन डायबिटीज के कारणों का पता नहीं लग सका है, लेकिन काफी हद तक जेनेटिक कारण इसकी वजह बताई जा रही है। पीजीआई में डायबिटीज पीड़ित बच्चों की संख्या सौ से ज्यादा पार हो चुकी हैं।
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बीमारी से लड़ने के लिए बच्चों को ट्रेनिंग

डॉ. संजय के मुताबिक छोटी उम्र में डायबिटीज से बच्चे मानसिक रूप से परेशान हो जाते हैं। ऐसे बच्चों का हौसला बढ़ाने के लिए पीजीआई अदिति नामक संस्था के साथ महीने में एक बार आउटिंग, ट्रैवलिंग और फन गेम्स का आयोजन करता है।

इसका फायदा यह हुआ कि बच्चे अब डायबिटीज को भूल चुके हैं। इंसुलिन को वे एक रुटीन प्रक्रिया समझने लगे हैं। डॉक्टर और पेरेंट्स के बीच एक भावनात्मक रिश्ता बन गया है। बच्चों में एक आत्मविश्वास आ गया है। ये एक्टिविटीज पूरे देश में सिर्फ पीजीआई में ही होती है।

क्या है टाइप वन
यह बचपन में या किशोर अवस्था में अचानक इंसुलिन के उत्पादन की कमी होने से पैदा होने वाली बीमारी है। इसमें इंसुलिन हॉर्मोन बनना पूरी तरह बंद हो जाता है।

ऐसा किसी एंटीबॉडी की वजह से बीटा सेल्स के पूरी तरह से काम करना बंद करने से होता है। ऐसे में शरीर में ग्लूकोज की बढ़ी हुई मात्रा को कंट्रोल करने के लिए इंसुलिन के इंजेक्शन की जरूरत होती है। इसके मरीज काफी कम होते हैं।
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