छोटे बच्चों में टाइप-वन डायबिटीज गंभीर समस्या बनती जा रही है। पीजीआई के इंडोक्रिनोलॉजी डिपार्टमेंट का दावा है कि उनके पास सबसे छोटी उम्र का मरीज आया है। मात्र आठ माह का मासूम डायबिटीज से पीड़ित अब आठ साल का हो चुका है।
पीजीआई के इंडोक्रिनोलॉजी डिपार्टमेंट के एचओडी डॉ. अनिल भंसाली और डॉ. संजय बडाडा ने बताया कि अब इस बच्चे को पूरी जिंदगी भर बाहर से इंसुलिन देनी पड़ेगी। एक बच्चे को दिन में कम से कम चार बार इंसुलिन के डोज दिए जाते हैं, जो बहुत ही पीड़ादायक होते हैं। इससे बच्चा ही नहीं बल्कि पूरा परिवार डिस्टर्ब हो जाता है।
यदि इंसुलिन नहीं मिलती है तो दूसरी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं। उन्होंने बताया कि अब बच्चा बड़ा हो गया है, लेकिन मुश्किलें जस की तस हैं। उनके क्लीनिक में डायबिटीज पीड़ित बच्चों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
हालांकि अब तक टाइप वन डायबिटीज के कारणों का पता नहीं लग सका है, लेकिन काफी हद तक जेनेटिक कारण इसकी वजह बताई जा रही है। पीजीआई में डायबिटीज पीड़ित बच्चों की संख्या सौ से ज्यादा पार हो चुकी हैं।