हादसे ने 65 साल की रामप्यारी की जिंदगी छीन ली, लेकिन दुनिया से विदा होते-होते उन्होंने दो लोगों को नई जिंदगी दे दी और उनके घर रोशन हो गए। दरअसल रामप्यारी की दोनों किडनी उन परिवारों को दी र्गइं जिनकी किडनी खराब हो चुकी थीं। हादसे में घायल होने के बाद रामप्यारी को पटियाला के हास्पिटल में दाखिल कराया गया। उसके बाद जीएमसीएच 32 और फिर पीजीआई रेफर कर दिया गया।
डाक्टरों ने उन्हें बचाने की भरपूर कोशिश की। मगर बचा नहीं पाए। डाक्टरों ने उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया। बाद में उनके बेटे राजेंद्र कुमार से आर्गन डोनेशन की बात की गई तो वे इसके लिए तैयार हो गए। डाक्टरों ने जांच की तो उनकी दो किडनियां सही निकलीं, जो उन मरीजों के काम आई, जिनकी किडनी खराब हो चुकीं थीं।
समाजसेवी हैं रामप्यारी के बेटे
ट्रांसप्लांट कोआर्डिनेटर नवदीप बंसल ने बताया कि रामप्यारी के बेटे राजेंद्र कुमार खुद एक सोशल वर्कर हैं। वे रेगुलर ब्लड डोनेट करते हैं। आर्गन डोनेशन के बारे में पहले से ही जानकारी थी। जब फैमिली से बात की गई तो उन्होंने फैसले लेने में कोई देरी नहीं की।
राजेंद्र कुमार ने बताया कि उनकी मां हमेशा से दूसरों का भला सोचती थीं। अंजान व्यक्ति की मदद के लिए भी वे हर वक्त तैयार रहती थीं। वे भले ही इस जिंदगी में नहीं है, लेकिन आर्गन डोनेशन के बाद ऐसा लगता है कि वे यहीं हैं। वे भले ही आंखों के सामने नहीं हैं मगर किसी दूसरे की जिंदगी को रोशन कर रही हैं।
पीजीआई का इस साल 36वां आर्गन डोनेशन
इस साल पीजीआई ने आर्गन डोनेशन में नया रिकार्ड बनाया है। साल 2017 में 36 आर्गन डोनेट किए गए हैं। जबकि पिछले साल सिर्फ 27 हुए थे। इन आर्गन डोनेशन से कई लोगों को नई जिंदगी मिली है। इसके पीछे पीजीआई का जागरूकता अभियान है। जो पिछले दो सालों से ट्राइसिटी में लोगों को अंगदान के लिए जागरूक कर रहे हैं।
रोटो के नोडल आफिसर डा. विपिन कौशल ने बताया कि अब भी जागरूकता की दिशा में काफी काम करना है। जब तक हर व्यक्ति अंगदान के लिए जागरूक नहीं होगा, तब तक पीजीआई की कोशिश जारी रहेगी।
राम प्यारी के परिजनों ने जो कदम उठाया है, वो न सिर्फ एक साहस से भरा है बल्कि समाज के लिए एक मिसाल भी है। इससे अन्य लोगों में जागरूकता भी आएगी। पीजीआई के डाक्टरों और रोटो की टीम ने भी शानदार काम किया है।
- डा. विपिन कौशल, नोडल आफिसर रोटो पीजीआई