फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

#AUExclusive: 52 हजार का घुटना इम्प्लांट मरीजों को मिल रहा 90 हजार में

Fri, 24 Mar 2017 09:31 AM IST
आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
विज्ञापन
पीजीआई में मरीज को महंगा पड़ता है घुटना ट्रांसप्लांट - फोटो : Demo Pic
विज्ञापन
घुटना ट्रांसप्लांट कराने में आम आदमी घुटने टेक देता है। आरोप हैं कि कार्डियक स्टेंट की तरह इसमें भी कमीशन का खेल चलता है। डिस्ट्रीब्यूटर से मरीज तक पहुंचने में उसका रेट दो गुना महंगा हो जाता है। रेट महंगे होने के पीछे डिस्ट्रीब्यूटर व डाक्टरों की मिलीभगत और अस्पतालों में रेट फिक्स न होना है। इस वजह से मरीज ठगते जा रहे हैं। पीजीआई में दोनों पैरों का घुटना ट्रांसप्लांट कराने का खर्च ढाई लाख रुपये आता है। जबकि बड़े प्राइवेट अस्पतालों में इसका रेट करीब चार से साढ़े चार लाख रुपये है।
विज्ञापन


अमर उजाला ने अपनी जांच में पाया है कि डिस्ट्रीब्यूटर के पास जब घुटना आता है, तब  उसकी कीमत (48-52 हजार रुपये) होती है। ये विदेशी कंपनियों के रेट हैं। देसी कंपनियों के रेट 35-40 हजार रुपये है। डिस्ट्रीब्यूटर से सीधे मरीज के पास घुटना पहुंचता है। तब इसकी कीमत 90 हजार से लेकर एक लाख तक पहुंच जाती है। बीच में कोई भी एजेंसी नहीं है। पीजीआई और दूसरे अस्पतालों में डाक्टर सीधे डिस्ट्रीब्यूटर के पास मरीज को भेजते हैं। डाक्टर और डिस्ट्रीब्यूटर के बीच संपर्क है। डाक्टर ही बताते हैं कि किससे सामान लेना है, किससे नहीं।

पीजीआई में एक मरीज को इतने का पड़ता है घुटना ट्रांसप्लांट
मरीज को एक घुटना इम्प्लांट करीब 90 हजार से एक लाख में पड़ता है। उसके बाद करीब 30 हजार रुपये का सर्जिकल आइटम। इसमें दवाइयों, अस्पताल में रहने और फिजियोथैरेपिस्ट का खर्च शामिल नहीं है। इनमें भी करीब 15-20 हजार रुपये का खर्च आता है। कुल मिलाकर एक घुटना ट्रांसप्लांट करने में करीब डेढ़ लाख रुपये का खरचा आता है। यदि किसी को  अपने परिवार के किसी सदस्य को घुटना ट्रांसप्लांट कराना हो तो कम से कम ढाई से तीन लाख रुपये का खरचा आता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

स्टेंट पर लगाम लगाई तो इस पर क्यों नहीं?

पीजीआई में मरीज को महंगा पड़ता है घुटना ट्रांसप्लांट - फोटो : Demo Pic
स्टेंट पर लगाम लगाई तो इस पर क्यों नहीं
आर्थोपेडिक्स इम्प्लांट (घुटना-हिप) के रेट पर किसी का नियंत्रण नहीं है। न तो नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) का कोई शिकंजा और न ही पीजीआई प्रशासन का। हाईकोर्ट के आदेश के बाद एनपीपीए ने कार्डियक स्टेंट के रेट तय कर दिए थे, लेकिन आरथोपीडिक्स इम्प्लांट पर ध्यान नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि घुटना इम्पलांट के रेट निर्धारित कर दिए जाएं तो मरीजों को काफी हद तक राहत मिल सकती है।

पीजीआई प्रशासन से जगी उम्मीद की आस
पीजीआई प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया है कि आरथोपीडिक्स इंप्लांट के दाम तय करने की कवायद शुरू कर दी है। इसके लिए पीजीआई ने प्रोफेसर केएलएन राव के नेतृत्व में एक कमेटी गठित कर दी है। कमेटी ने इस पर काम भी शुरू कर दिया है। कमेटी अलग-अलग कंपनियों के रेट और मैन्युफैक्चरिंग कास्ट की समीक्षा कर रही है। यदि पीजीआई ऐसा करने में सफल होता है तो यह देश का पहला संस्थान होगा, जिसमें आरथों के इंप्लांट के दाम फिक्स होंगे। आरथोपीडिक्स इंप्लांट में घुटना, कूल्हा व ट्रामा से संबंधित इंप्लांट शामिल होंगे।

कई दवा व इम्प्लांट कंपनियां मरीजों से 200-500 प्रतिशत प्राफिट कमा रही हैं। उनके एमआरपी रेट इतने ज्यादा होते हैं कि डिस्काउंट देने के बावजूद वे काफी कमाई कर रहे हैं। सरकार को चाहिए कि वे मैन्युफैक्चरिंग कास्ट पता करके उसके प्राफिट को जोड़कर सीधे अस्पताल के लिए खरीदे तो मरीजों को काफी राहत मिलेगी। डाक्टर और डिस्ट्रीब्यूटर का खेल भी खत्म होगा।
आरके गर्ग, आरटीआई एक्टिविस्ट, चंडीगढ़
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें