चंडीगढ़। माता-पिता को यूं ही भगवान का दर्जा नहीं दिया गया। एक दंपती में लोगों ने रविवार को उस समय भगवान का रूप देखा, जब उन्होंने अपनी 39 दिन की बच्ची की मौत के बाद अंगदान का निर्णय लेकर दूसरे को नया जीवन दिया। यह निर्णय आसान नहीं था, लेकिन दंपती ने हिम्मत दिखाई। उनकी बच्ची की किडनी का पीजीआई में ट्रांसप्लांट किया गया। उसकी दोनों किडनी से किसी दूसरे इंसान को नया जीवन मिला। माता-पिता का कहना है कि उनकी बच्ची किसी दूसरे को ही जीवन देने के लिए आई थी। बच्ची के जाने का दुख बहुत है, लेकिन जाते-जाते वह सबको रुला गई।
28 अक्तूबर को हुआ था जन्म
पंजाब के अमृतसर के रहने वाले कृषि विकास अधिकारी सुखबीर सिंह संधू और विज्ञान की शिक्षिका सुप्रीत कौर के घर 28 अक्तूबर को बच्ची का जन्म हुआ। उसका नाम अबाबत कौर संधू रखा। दंपती बेटी के आने की खुशी मना रहे थे, उन्हें क्या पता था कि बेटी को कोई बीमारी है। बेटी की तबीयत ज्यादा खराब होने पर दंपती पीजीआई लेकर पहुंचे थे। पीजीआई के चिकित्सकों ने जांच में पाया कि उसके दिमाग तक खून नहीं पहुंच पा रहा है। वह अधिक समय तक जिंदा नहीं रह सकेगी और कुछ समय बाद ही अबाबत कौर के दिल की धड़कन बंद हो गई।
इस तरह लिया गया ट्रांसप्लांट का निर्णय
कुछ समय बाद अबाबत के माता-पिता ने सोचा कि क्यों न अबाबत कौर को किसी न किसी रूप में दूसरे इंसान में जीवित रखा जाए और उन्होंने अंगदान का निर्णय लिया। उन्होंने पीजीआई टीम को बताया। पीजीआई की टीम भी तैयार हो गई। पीजीआई ने बिना देरी किए तय किया कि बच्ची की किडनी ही निकाल सकते हैं, लेकिन यह किसे प्रत्यारोपित की जाएगी, उसकी भी रिपोर्ट निकाली गई और सारी तैयारियों के बाद लगभग दो घंटे के ऑपरेशन में ट्रांसप्लांट सर्जन प्रो. आशीष शर्मा की टीम को सफलता मिली और अबाबत की किडनी से पटियाला जिले के एक 15 वर्षीय किशोर को जीवनदान मिल गया। पीजीआई की टीम ने कहा कि माता-पिता का यह निर्णय लेना आसान नहीं था, लेकिन ऐसे माता-पिता बहुत कम होते हैं, जिन्होंने नेक काम किया। उनके इस निर्णय से अन्य लोग भी जागरूक होंगे। रोटो पीजीआई के नोडल अधिकारी प्रो. विपिन कौशल ने कहा कि यह दुर्लभ ट्रांसप्लांट था।
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पीजीआईएमईआर के विशेषज्ञों की टीम ने इस लैंडमार्क ट्रांसप्लांट को एक कम समय सीमा के अंदर सफल बनाया है लेकिन माता-पिता के निर्णय के बिना यहां तक पहुंचना संभव नहीं था। निस्वार्थ भाव से किडनी दान की। उनके निर्णय से अन्य लोगों को प्रेरणा मिलेगी।
- प्रो. जगतराम, निदेशक, पीजीआई
तीन दिन के बच्चे की किडनी से दिया था नया जीवन
इससे पहले इसी साल पीजीआई ने तीन दिन के एक शिशु की किडनी का 21 वर्षीय युवती में ट्रांसप्लांट किया था। यह पीजीआई का पहला अनुभव था, जब इतनी छोटी उम्र के किसी शिशु की किडनी निकालकर सफलतापूर्वक किसी दूसरे मरीज में ट्रांसप्लांट की गई। पीजीआई साल 1996 से आर्गन ट्रांसप्लांट प्रोग्राम चला रहा है। इसके तहत पीजीआई सैकड़ों मरीजों को नया जीवन दे चुका है।