इसके बाद संस्था इस केस को आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल लेकर गई। अदालत में फौज के अधिकारियों ने कहा कि फौजी से संबंधी कोई दस्तावेज उनके पास नहीं है। इसके बाद उनकी संस्था की तरफ से फौजी से संबंधी सारे दस्तावेज जमा करवाए गए।
सेना पेंशन देने के हक में नहीं थी
अदालत में सेना के अधिकारियों ने सवाल किया कि 46 साल बाद फौजी पेंशन का केस क्यों लड़ रहा है, इससे पहले मांग क्यों नहीं की। इस पर अदालत ने सेना को लताड़ लगाई। साथ ही कहा कि सेना को पेंशन देनी होगी और इसके साथ मुआवजा भी दिया जाए। इसके बाद अदालत ने सिपाही बलदेव सिंह को पंद्रह हजार रुपये प्रति माह पेंशन और पांच साल का मुआवजा चार महीने में देने का आदेश दिया।
एक कागज के सहारे लड़ा केस
लेफ्टिनेंट कर्नल सोही ने कहा कि बलदेव सिंह ने इस केस को एक कागज के सहारे जीता है। सेना की दलील थी कि उनके पास दस्तावेज नहीं हैं। वहीं, हमारे पास केवल फौजी की डिस्चार्ज बुक थी, जिसको ही आधार बनाकर केस लड़ा गया। उन्होंने कहा कि पहले भी उन्होंने कई फौजियों को उनकी पेंशन दिलाने में अहम भूमिका निभाई है। वहीं, यह प्रयास आगे भी जारी रहेगा।