जलियांवाला बाग हमें याद दिलाता है कि हमारी आजादी कितने ही बलिदानों की कीमत पर हासिल हुई है। पावन स्थल देखकर मेरा मन उदासी से भर गया। यह कहना है देश के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायड़ू का, जो शनिवार को जलियांवाला बाग नरसंहार की 100वीं बरसी पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए अमृतसर पहुंचे। उपराष्ट्रपति ने इस मौके पर आयोजित शताब्दी समारोह में एक डाक टिकट व 100 रुपये का चांदी का सिक्का जारी करके शहीदों को नमन किया।
डाक टिकट पर जलियांवाला बाग में शहीदों की याद में बनाई गई शहीदी लाट व शहीदी कुएं की तस्वीर के साथ-साथ शहीद ऊधम सिंह की भी फोटो है। चांदी के सिक्के में शहीदी लाट व भारतीय करेंसी में अशोक चक्र का चिह्न है। उपराष्ट्रपति ने शहीदी लाट में ‘रीथ’ अर्पित करके शहीदों को श्रद्धासुमन भेंट किए। इस अवसर पर पंजाब पुलिस की टुकड़ी ने शस्त्र उलटे करके सलामी दी। शर्मा बंधुओं ने देशभक्ति गीत गाए। कार्यक्रम का शुभारंभ शबद गायन से हुआ। इस दौरान कोई भाषण कार्यक्रम नहीं हुआ।
नायड़ू ने जलियांवाला बाग के शहीदों को याद करते हुए ट्वीट में लिखा ‘जलियांवाला बाग हमें याद दिलाता है कि हमें आजादी कितने ही बलिदानों की कीमत पर हासिल हुई है। यह अवसर हर निर्दोष भारतीय नागरिक की स्मृति में अश्रुपूर्ण मौन श्रद्धांजलि अर्पित करने का है, जिसने 1919 में बैसाखी के इस दिन जालियांवाला बाग नरसंहार में अपने प्राणों की आहुति दी। यह वेदनापूर्ण अवसर औपनिवेशिक अंग्रेजी हुकूमत की नृशंसता पर विचार करने का है।
विजिटर बुक में लिखा- पावन स्थल ने भीतर तक उदास कर दिया है
जलियांवाला बाग की विजिटर बुक में उपराष्ट्रपति ने लिखा ‘अंग्रेजों के दमनकारी शासन को खत्म करने के लिए अपने जीवन को न्योछावर करने वाले शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए मैं खुद को अत्यन्त विनम्र व साधारण अनुभव कर रहा हूं। मैं उन शहीदों को नमन करता हूं। यह स्थान व यहां हुए नरसंहार के इतिहास को देखकर मेरे भीतर एक गहरी उदासी छा गई है। शहीदों के दृढ़ निश्चय व साहस के लिए गर्व भी महसूस हो रहा है।
शताब्दी बाद आज भी हर भारतीय महसूस करता है पीड़ा
सोशल मीडिया पर अपने संदेश में उपराष्ट्रपति ने कहा कि इस अमानवीय त्रासदी के 100 साल बीतने के बाद भी, उसकी पीड़ा हर भारतीय आज भी अपने हृदय में महसूस करता है। इतिहास घटनाओं का क्रमवार संकलन मात्र नहीं है, वह यह भी दिखाता है कि इतिहास में किस प्रकार कुत्सित कुटिल मानसिकता किस हद तक गिर सकती है। इतिहास हमें अपनी गलतियों से सीख लेने के लिए आगाह भी करता है और सिखाता है कि नृशंस अत्याचार की आयु कम ही होती है।
इतिहास से सीखकर बेहतर भविष्य बनाएं
उपराष्ट्रपति ने देशवासियों से आग्रह किया कि वे इतिहास से सीख लेकर, मानवता को एक बेहतर भविष्य देने की दिशा में प्रयास करें। दुनिया के हर कोने में स्थायी शांति स्थापित करने के लिए साझा प्रयास करें। स्कूल से लेकर विश्व के नेताओं की उच्च शिखर वार्ताओं तक, हर समय और हर स्तर पर, एक स्थायी, सतत और प्रकृति सम्मत विकास ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए।
बिना शांति के विकास संभव नहीं। उपराष्ट्रपति ने आग्रह किया कि विश्व के देश एक नई और बराबरी की वैश्विक व्यवस्था स्थापित करें, जहां सत्ता, शक्ति और उत्तरदायित्व साझा हों। सभी के विचार और अभिव्यक्ति को सम्मानपूर्वक सुना जाए, प्राकृतिक संपदा और धरती के संसाधन भी साझा हों।
उन्होंने कहा कि आज का दिन मनुष्य के उस अदम्य साहस की याद दिलाता है, जिसने गोलियों के बौछारों के सामने भी शांति और आजादी का परचम बुलंद रखा। यह अवसर हमको याद दिलाता है कि हमारी आजादी कितने ही बलिदानों की कीमत पर मिली है। आज उन शहीदों की स्मृति में अश्रुपूरित मौन श्रद्धांजलि देने का अवसर है, जिन्होंने 1919 में बैसाखी के दिन अपने प्राणों की आहुति दी थी।
उपराष्ट्रपति ने आशा व्यक्त की कि आज का दिन हमें शोषण और दमन से मुक्त विश्व का निर्माण करने की दिशा में प्रयास करने के लिए प्रेरित करेगा। एक ऐसा विश्व जहां मैत्री, शांति और विकास पनपे। जहां सभी राष्ट्र अमानवीय आतंकवाद और हिंसा की शक्तियों के विरुद्ध साझा कार्रवाई करें। आज के दिन हम वसुधैव कुटुंबकम के आदर्श के प्रति संकल्पबद्ध हों।