पहले एग्जामिनेशन एंजाइटी और अब नतीजों का डर। पिछले कुछ माह में परीक्षाओं के दौरान और बाद में विद्यार्थियों तथा तनाव का चोली दामन का साथ रहा है। आठवीं कक्षा के नतीजे घोषित होने के बाद स्कूली शिक्षा बोर्ड की दसवीं और बारहवीं के परीक्षा परिणामों के नतीजों को लेकर छात्रों की धड़कने तेज हो गई हैं।
सफलता के लिए छात्रों को प्रभु भी याद आ गए हैं। बढ़ती तपिश ने परीक्षार्थियों के तनाव को और बढ़ा दिया है। मनोचिकित्सकों के अनुसार ऐसा तनाव असफल छात्रों में नकारात्मक सोच लाता है। जिसके कई बार गंभीर परिणाम सामने आते हैं। नतीजों को लेकर अफवाहों का बाजार भी गर्म है।
मार्च के अंत में दसवीं और बारहवीं कक्षा की बोर्ड की परीक्षाएं समाप्त हुई थीं। परीक्षा देने के बाद विद्यार्थी थोड़ा तनाव मुक्त हुए थे। लेकिन गत दिवस आठवीं का परीक्षा परिणाम निकलने के बाद उक्त दोनों बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों को लेकर विद्यार्थियों में इंतजार बढ़ गया है।
इसमें बारहवीं के विद्यार्थी परीक्षा परिणाम निकलने के बाद कालेज जाने का सपना देख रहे हैं तो कुछ प्रवेश परीक्षा को पास करके इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई करने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन बोर्ड परीक्षाओं के नतीजों को लेकर विद्यार्थियों में उत्साह और तनाव दोनों हावी हैं। मनोचिकित्सक डा. जगदीश थापा के अनुसार उन बच्चों को ज्यादा तनाव झेलना पड़ता है, जो खुद से या उनके परिवार के सदस्य उनसे क्षमता से ज्यादा अपेक्षाएं रख लेते हैं।
ऐसे में जब नतीजे कम आते हैं तो बच्चे पर ज्यादा दबाव रहता है। इनमें कई बच्चों का नतीजे की सूचना मिलते ही रोना शुरू होना, घबराहट, चिल्लाना, हाथ पांव फूलने जैसे लक्षण भी रहते हैं।
परीक्षाओं के नतीजों की जब भारी आती है तो कई बच्चों को असफल होने का डर सताने लगता है। इस डर में तनाव की घुसपैठ भी साथ में हो जाती है। इसमें कुछ बच्चे भारी तनाव में चले जाते हैं, जो उनके लिए यह परिस्थितियां घातक होती हैं। इन मामलों में शहरी इलाकों के विद्यार्थी ज्यादा प्रभावित हुए हैं। इसका मुख्य कारण यहां हर स्तर पर प्रतिस्पर्धा ज्यादा होना है।
बचाव
1. अभिभावक बच्चों से जाने उनकी परीक्षाएं कैसे हुईं
2. बच्चों की खामियों को दूर करने के प्रयास करें
3. असफल रहने पर डांट डपट के बजाय प्रोत्साहित करें
4. नतीजों के आने पर उनकी गतिविधियों पर ध्यान दें