चपीयू में ईसी कोर्ट सदस्य चुनाव के लिए तीनों संगठनों के उम्मीदवारों ने पूरा दिन प्रचार अभियान जारी रखा। चुनाव की घोषणा के ठीक बाद विवि के लेफ्टआउट कर्मचारियों (जिन्हें सचिवालय वेतन नहीं मिल रहा है) ने बैठक कर चुनाव में एक तरफ जाने को लेकर चरचा की है।
इससे जाहिर है कि सालों से सचिवालय वेतन की मांग कर रहे इन छूटे अलग-अलग वर्ग के कर्मचारियों ने चुनाव में मुख्य मुद्दे सभी उम्मीदवारों के समक्ष रखने की रणनीति बना ली है। जिस विचारधारा का उम्मीदवार उनकी इस मांग को पूरा करवाने को लेकर उन्हें आश्वस्त करेगा, इनका मत उसी के पाले में जा सकता है। ऐसे में उनका वोट निर्णायक हो सकता है।
हालांकि पिछली बार चुने गए ईसी कोर्ट सदस्यों ने भी अपने घोषणा पत्र में इस मुद्दे को रखा था, मगर आज तक उनकी यह मांग पूरी नहीं करवाई जा सकी है। लेफ्ट आउट केटेगरी में 12 केटेगरी के तकनीकी और प्रोफेशन कर्मचारी व अधिकारी आते हैं, जिनकी संख्या 182 के करीब है।
इतनी अधिक तादाद में इन कर्मियों के होने से चुनावी मैदान में उतरे उम्मीदवारों के लिए भी उन्हें मनाना और अपने पक्ष में करना चुनौती से कम नहीं है। तीनों ही संगठनों के मैदान में उतरे उम्मीदवार इन कर्मियों को हर हाल में मांग पूरी करवाने का वादा कर रहे हैं। उधर, ये कर्मी दो टूक कह रहे हैं कि इस बार एक तरफ ही उनका मत जाएगा। इससे जीत में उनका मत अहम होगा।
जर्जर एचपीयू मॉडल स्कूल को क्यों भूल जाते हैं?- एचपीयू मॉडल स्कूल के जर्जर भवन और वहां मासूमों की जान पर हर समय बने रहे खतरे को हर चुनाव में कर्मी भूल जाते हैं। जबकि सीधे तौर पर स्कूल का मामला कर्मचारियों से जुड़ा नहीं है, मगर इसी स्कूल में विश्वविद्यालय के आम निचले स्तर के कर्मचारियों के बच्चे पढ़ते हैं।
मिट्टी के बने जर्जर भवन की हालत ऐसी है कि दीवारें कभी भी ढहकर कहर बरपा सकती हैं। नए भवन निर्माण को दो करोड़ स्कूल निर्माण शाखा में जमा है, मगर सालों से भवन निर्माण शुरू ही नहीं हो पाया है। जबकि स्कूल मैनेजमेंट में गैर शिक्षक कर्मचारी संघ के चुने पदाधिकारी भी सदस्य होते हैं।
इस स्कूल की दशा सुधारने का मामला कभी चुने नुमाइंदे शायद ही उठाते हैं। उनकी मांगें सिर्फ पदोन्नतियों, उसमें विशेष छूट, वेतन बढ़ोतरी जैसे मामलों तक ही सिमटकर रह जाती है। जबकि स्कूल सुधार का मुद्दा हर चुनाव में मुख्य मुद्दा होना चाहिए।