भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार के बीच चली आ रही तनातनी शायद सोमवार की बैठक के बाद खत्म हो सकती है। इस बैठक से कई अहम मुद्दों के सुलझने की उम्मीद जताई जा रही है। बैठक में बोर्ड के सभी 18 सदस्य हो सकते हैं।
बैठक में आरबीआई की तरफ से गवर्नर उर्जित पटेल और चार डिप्टी गवर्नर हैं। वहीं, आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग और वित्त सेवा सचिव राजीव कुमार बोर्ड में सरकार की तरफ से हैं। इसके अलावा, बोर्ड में 11 सदस्य ऐसे भी होते हैं, जिन्हें केंद्र सरकार नियुक्त करती है। आरबीआई के इन गैर-आधिकारिक निदेशकों की नियुक्तियां चार साल के लिए की जाती है।
मौजूदा बोर्ड में कुछ सदस्य ऐसे भी हैं, जिनके सरकार से रिश्तों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। हम आपको उन सदस्यों के बारे में कुछ खास बातें बताते हैं, जो सरकार की ओर से नियुक्त किए गए हैं और आरबीआई की बैठक में ये लोग अहम भूमिका निभा सकते हैं।
कौन कर सकता है ये नियुक्तियां?
अमूमन इस तरह की नियुक्तियों का प्रस्ताव केंद्रीय वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग की ओर से सरकार को भेजा जाता है और 'अप्वॉइंटमेंट कमेटी ऑफ कैबिनेट (एसीसी)' इन नियुक्तियों पर मुहर लगाती है।
'गैर-आधिकारिक निदेशक' का ये पद इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि आरबीआई के महत्वपूर्ण निर्णयों में इस 'मार्गदर्शक मंडल' की सलाह अहम होती है। नियुक्ति के वक़्त भी ये सवाल उठाया गया है कि क्या ऐसे अहम पदों पर सरकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस से जुड़े लोगों को ही बैठाना चाहती है?
जानकार कहते हैं कि ऐसी प्रथा रही है कि आरबीआई ही सदस्यों के नामों के सुझाव देता रहा है। मगर आरोप हैं कि इस बार सरकार ने खुद ही ये नियुक्तियां की हैं और ऐसा करने से पहले सरकार ने आरबीआई से कोई सलाह भी नहीं ली। इनमें संघ के विचारक स्वामीनाथन गुरुमूर्ति का नाम सबसे अहम है।