आरबीआई की ओर से लगातार दो बार रेपो रेट 0.25-0.25 फीसदी की कटौती के बावजूद बैंकों द्वारा ऋण पर ब्याज दर में तत्काल इतनी कटौती संभव नहीं है। यह कहना है पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) के एमडी एवं सीईओ सुनील मेहता का। वह कहते हैं कि जैसे-जैसे बैंकों की कोष घटाने की लागत घटती है, ऋण पर ब्याज दरों में कटौती होती है। शिशिर चौरसिया ने सुनील मेहता से इस संबंध में और पीएनबी के कामकाज पर बातचीत की। पेश है कुछ अंश:-
आरबीआई ने दो बार रेपो रेट में 0.25-0.25 फीसदी की कटौती की है। लेकिन पीएनबी ने ऋण पर ब्याज दर में बमुश्किल 0.10 फीसदी की ही कटौती की?
मैं बताना चाहूंगा कि आरबीआई की ओर से ब्याज दर में कटौती के बाद पीएनबी ने तुरंत ऋण पर ब्याज दर घटाने का फैसला किया है। रेपो रेट में कटौती के बराबर ब्याज दर में तुरंत कटौती का जहां तक सवाल है तो व्यवहार में ऐसा तब तक संभव नहीं है जब तक हमारी कोष जुटाने की लागत नहीं घटती। आपको पता ही होगा कि अब हमलोग एमसीएलआर के आधार पर ऋण पर ब्याज दर तय करते हैं। यह तरीका भी आरबीआई ने ही सुझाया है।
अब हमारी जो भी कोष जुटाने की लागत होती है, उस पर थोड़ा बहुत स्प्रेड रखकर हम ब्याज दर तय करते हैं। रेपो रेट जैसे ही घटता है, वैसे ही हमारी कोष जुटाने की लागत तुरंत नहीं घट जाती है। इसमें देर लगती है। इसलिए हम ऋण पर भी ब्याज दर घटाने में देर लगाते हैं। आप यदि इस समय पूरे बैंकिंग जगत में देखें तो हमारी ब्याज दरें अन्य बैंकों से कम ही है।
बीते वित्त वर्ष पीएनबी को 9,975 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। इसे आप कैसे देखते हैं?
उत्तर- पिछले वित्त वर्ष पीएनबी का परिणाम बेहद उत्साहवर्द्घक रहा है। हमें तकनीक तौर पर भले ही 2018-19 में करीब 10 हजार करोड़ रुपये का घाटा हुआ, लेकिन करीब 13,000 करोड़ रुपये का परिचालन लाभ भी हुआ। देखिए, फंसे कर्ज की वजह से बैंक को करीब 23,000 करोड़ रुपये की प्रोविजनिंग करनी पड़ी। इसलिए घाटा हो गया। प्रोविजनिंग नहीं करनी होती हो काफी लाभ होता। पिछले वित्त वर्ष बैंक के घरेलू कारोबार में 11 फीसदी से भी ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है, जबकि कुल घरेलू ऋण भी 14 फीसदी ज्यादा दिया गया है।
एनपीए के मोर्चे पर बैंक गंभीर हालात से जूझ रहा है। बीते वित्त वर्ष इसका कैसा प्रबंधन रहा?
यह सही है कि पिछले कुछ साल के दौरान पीएनबी के कुछ निर्णय गलत साबित हुए और कुछ बड़े घोटाले भी सामने आए। लेकिन अब स्थिति काबू में है। ग्रॉस एनपीए की जहां तक बात है तो वित्त वर्ष 2017-18 में बैंक का कुल एनपीए 86,620 करोड़ रुपये (18.38 फीसदी) था, जो कि 2018-19 में घटकर 78,473 करोड़ (15.50 फीसदी) रह गया है। नेट एनपीए भी पिछले वित्त वर्ष 6.56 फीसदी रहा है, जबकि उससे पिछले वित्त वर्ष में यह 11.24 फीसदी पर था। हम लगातार इस दिशा में तरक्की की राह पर हैं।
आपने एक घोटाले का जिक्र किया, जो नीरव मोदी मामले की ओर इशारा करता है। इस पर लगाम कसने की क्या व्यवस्था हुई है?
मैं समझ रहा हूं कि आप किस मामले का जिक्र कर रहे हैं। हमनेे पहले इस मामले का अध्ययन किया और उसके तह में पहुंचे कि आखिर यह कैसे हुआ। अब हमने अपने स्विफ्ट सिस्टम को केंद्रीयकृत बैंकिंग सिस्टम (सीबीएस) से इंटीग्रेट कर दिया है। इसके अलावा अब ट्रेड फाइनेंस के लिए एक केंद्रीयकृत बैक ऑफिस बनाया है। अब जिन भी शाखाओं में इस तरह का कारोबार होता है, उसकी समीक्षा केंद्रीयकृत बैक ऑफिस में होती है। इससे गड़बड़ी या चूक की आशंका न्यून हो जाती है।
आपने 2019-20 के लिए मार्केटिंग स्ट्रैटजी में गंभीर बदलाव का खाका खींचा है। करेंगे क्या?
आप पहले किसी सरकारी या निजी बैंक की शाखाओं में जाते होंगे तो निजी बैंक की शाखाएं ज्यादा आकर्षित करती होंगी। वहां का कामकाज आपको आकर्षित करता होगा। हमने उसी तरह से अपनी मार्केटिंग स्ट्रैटजी बदली है। अब हमारे मार्केटिंग से जुड़े अधिकारियों के पास हमारे बड़े ग्राहकों (हाई नेटवर्थ कस्टमर) की सूची है। वह जानते हैं कि ऐसे ग्राहकों की क्या जरूरतें हैं। इस दिशा में हम और आगे बढ़ेंगे एवं इसे एक संगठित रूप देंगे।
सरकार चाहती है कि छोटे बैंकों का विलय कर बड़ा बैंक बनाया जाए। पीएनबी के साथ भी कुछ बैंकों के विलय की बात चल रही है?
हमें तो आपसे ही जानकारी मिली कि पीएनबी के साथ कुछ बैंकों को जोड़ने की तैयारी है। वैसे इस बारे में हमें सरकार की तरफ से कोई निर्देश नहीं मिला है। जैसे ही इस तरह का कोई निर्देश आएगा, हम उसी हिसाब से काम करेंगे।
''पीएनबी के साथ कुछ बैंकों को जोड़ने के संबंध में सरकार की ओर से कोई निर्देश नहीं है। निर्देश आने पर हम उसी हिसाब से काम करेंगे।'' -सुनील मेहता, एमडी एवं सीईओ, पंजाब नेशनल बैंक