सरकारी बैंकों में तीन महीने के दौरान करीब 20 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी हुई है। सूचना के अधिकार (आरटीआई) में इसका खुलासा हुआ है।
| बैंक | मामले | चपत (करोड़ में) |
| केनरा बैंक | 33 | 3,885.26 |
| बैंक ऑफ बड़ौदा | 60 | 2,842.94 |
| इंडियन बैंक | 45 | 1,469.79 |
| इंडियन ओवरसीज बैंक | 37 | 1,207.65 |
| बैंक ऑफ महाराष्ट्र | 9 | 1,140.37 |
| पंजाब नेशनल बैंक | 240 | 270.65 |
| यूको बैंक | 130 | 831.35 |
| सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया | 149 | 655.84 |
| पंजाब एंड सिंध बैंक | 18 | 163.3 |
| यूनियन बैंक | 49 | 46.52 |
पिछले साल 28 फीसदी बढ़े मामले
आरबीआई के हाल के आंकड़ों के मुताबिक, 2019-20 के दौरान बैंकों और वित्तीय संस्थानों में धोखाधड़ी के मामलों में 28 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जबकि मूल्य के लिहाज इसमें 159 फीसदी का इजाफा हुआ है। पिछले वित्त वर्ष में धोखाधड़ी के कुल 8,707 मामले सामने आए, जिसमें 1.85 लाख करोड़ की चपत लगी।
इस दौरान बैंकों और वित्तीय संस्थानों के साथ सबसे ज्यादा धोखाधड़ी लोन पोर्टफोलिया में हुई। पिछले वित्त वर्ष के दौरान धोखाधड़ी की कुल रकम का 76 फीसदी हिस्सा शीर्ष-50 कर्ज लेने वाले लोगों ने किया। हालांकि, इस दौरान ऑफ-बैंलेंस शीट और फॉरेक्स लेनदेन जैसे दूसरे बैंकिंग क्षेत्रों में धोखाधड़ी में कमी देखने को मिली।
धोखाधड़ी का पता लगाने में लगे दो साल
आरबीआई के मुताबिक, 2019-20 के दौरान बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों में धोखाधड़ी होने और उसका पता चलने का औसत समय दो साल रहा। इसका मतलब है कि धोखाधड़ी होने की तारीख और पकड़ में आने के समय के बीच 24 महीने का अंतर रहा।