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चिंता-मनी 8: मकान किराए से हैं परेशान, तो यहां जानिए इसका समाधान

Thu, 20 Aug 2020 05:02 PM IST
‌डिंपल अलवधी नारायण कृष्णमूर्ति, आर्थिक सलाहकार, नई दिल्ली
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प्रॉपर्टी - फोटो : pixabay
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32 वर्ष के सॉफ्टवेयर इंजीनियर रूपक अस्थाना कुछ वर्ष पहले पत्नी और छह वर्ष की बेटी के साथ बेहतर वित्तीय संभावनाओं की वजह से अपने गृहनगर लखनऊ से दिल्ली आ गए थे। उन्हें तेजी से आगे बढ़ती मझौली किस्म की टेक्नोलॉजी कंपनी में नौकरी मिल गई, जिसका मुख्यालय नोएडा में है। दिल्ली में उन्होंने ऐसी जगह जगह पर फ्लैट लिया जहां स्कूल होने के साथ मेट्रो की कनेक्टिविटी है, ताकि उन्हें दफ्तर जाने में मुश्किल ना हो। फ्लैट का किराया वैसे तो 22 हजार रुपये मासिक है, लेकिन बिजली का बिल और सोसाइटी के मेंटेनेंस सहीत यह करीब 26 हजार रुपये हो जाता है। उनके लिए यह किराया कुछ अधिक जरूर था, मगर सुविधाओं को देखते हुए ठीक था। 

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लॉकडाउन शुरू होने तक सब कुछ ठीक-ठाक था। मगर जब वेतन में 20 फीसदी की कटौती हुई, तो दूसरे अनेक लोगों की तरह अस्थाना की भी मुश्किल शुरू हो गई। वह दुविधा में हैं कि आखिर फ्लैट का किराया और दूसरे खर्च कैसे पूरे करें। 

मकान मालिक के अधिकार
लॉकडाउन की घोषणा के कुछ हफ्तों के भीतर ही व्यावसायिक संपत्तियों के मालिकों को कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ा, क्योंकि किराएदारों ने 'फोर्स मेज्योर' का सहारा लिया, यह ऐसा प्रावधान है, जो अप्रत्यशित कारण से होने वाले नुकसान के जोखिम से जुड़ा है। इस मामले में किराएदारों से किराए पर लिए गए परिसर से कमाई करना मुश्किल हो गया। माल के मालिकों, दुकानदारों, रेस्तरां के मालिकों के साथ ही व्यावसायिक कार्यालयों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, जिसका असर वहां काम करने वालों पर भी पड़ा है।

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कई लोगों ने अदालत की शरण ली और आग्रह किया कि लॉकडाउन की अवधि तक किराए को स्थगित रखना व्यावहारिक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि मकान मालिक कुछ समय तक के लिए भुगतान की छूट दे सकते हैं। हालात को देखते हुए कुछ मकान मालिकों ने खुद से पहल कर कुछ महीने के किराए में छूट दी, तो कुछ ने अनुबंध में बदलाव करते हुए किराए में रियायत दी। 

वेतन के 20 फीसदी के अधिक न हो किराया
आदर्श रूप में आपके मकान का किराया आप जो वेतन घर ले जाते हैं, उसके 15 से 20 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए। हालांकि अधिकांश लोग, खासतौर से शहर में रहने वाले कई बार अपने वेतन का 30 फीसदी मकान के किराए पर खर्च कर देते हैं, जिससे उनकी बचत में बड़ी सेंध लगती है। लंबे समय तक किराए पर रहना वित्तीय रूप से समझदारी नहीं है, खासतौर से तब और जब आप अपने मासिक वेतन का 20 फीसदी हिस्सा मकान के कराये पर खर्च करते हैं। ऐसे हालात में आपको रेडी टू मूव या मकान खरीदने पर विचार करना चाहिए, जिसकी ईएमआई आपके वेतन के 30 फीसदी से अधिक न हो। इससे आपको टैक्स में भी छूट मिलेगी और सच ये है कि मकान एक वित्तीय संपत्ति है। 
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अस्थाना के लिए समाधान
यदि आपने अपने मकान मालिक से संपर्क नहीं किया है, तो कीजिए और उनसे एक साल से छह माह की अवधि के लिए किराए में 30 से 35 फीसदी की कमी करने का आग्रह कीजिए। ऐसे कठिन समय में अनेक मकान मालिकों ने अपने किराएदारों के ऐसे आग्रह पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया है। चूंकि निकट समय में स्कूलों के खुलने की संभावना नहीं है और बहुत से कार्यालय वर्क फ्रॉम होम का विकल्प दे रहे हैं, लिहाजा आप भी अपने घर लखनऊ लौट सकते हैं, जहां आपको परिवार की मदद मिल सकती है। यदि वहां आपको अपने अभिभावकों के साथ रहना हो, तो आप उन्हें कुछ रकम किराए के बतौर भी दे सकते हैं, यह दिल्ली से कम ही होगी। अभी जरूरत है, अपने खर्चों में कटौती करने की। 

किराए का अर्थशास्त्र
  • मकान किराया मासिक आय से 20 फीसदी अधिक न हो। 
  • ऐसे किसी अनुबंध पर हस्ताक्षर न करें, जिसमें हर वर्ष के अंत में स्वत: किराया बढ़ जाए। 
  • यदि आपके बच्चों का स्कूल और आपका दफ्तर तथा बाजार वगैरह नजदीक हो, तो कुछ अधिक किराया देना व्यावहारिक होगा।
  • मकान के किराए के साथ आपको बिजली, मेंटेनेंस तथा मेड के वेतन पर भी विचार करना चाहिए। 
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