कई लोगों ने अदालत की शरण ली और आग्रह किया कि लॉकडाउन की अवधि तक किराए को स्थगित रखना व्यावहारिक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि मकान मालिक कुछ समय तक के लिए भुगतान की छूट दे सकते हैं। हालात को देखते हुए कुछ मकान मालिकों ने खुद से पहल कर कुछ महीने के किराए में छूट दी, तो कुछ ने अनुबंध में बदलाव करते हुए किराए में रियायत दी।
वेतन के 20 फीसदी के अधिक न हो किराया
आदर्श रूप में आपके मकान का किराया आप जो वेतन घर ले जाते हैं, उसके 15 से 20 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए। हालांकि अधिकांश लोग, खासतौर से शहर में रहने वाले कई बार अपने वेतन का 30 फीसदी मकान के किराए पर खर्च कर देते हैं, जिससे उनकी बचत में बड़ी सेंध लगती है। लंबे समय तक किराए पर रहना वित्तीय रूप से समझदारी नहीं है, खासतौर से तब और जब आप अपने मासिक वेतन का 20 फीसदी हिस्सा मकान के कराये पर खर्च करते हैं। ऐसे हालात में आपको रेडी टू मूव या मकान खरीदने पर विचार करना चाहिए, जिसकी ईएमआई आपके वेतन के 30 फीसदी से अधिक न हो। इससे आपको टैक्स में भी छूट मिलेगी और सच ये है कि मकान एक वित्तीय संपत्ति है।
अस्थाना के लिए समाधान
यदि आपने अपने मकान मालिक से संपर्क नहीं किया है, तो कीजिए और उनसे एक साल से छह माह की अवधि के लिए किराए में 30 से 35 फीसदी की कमी करने का आग्रह कीजिए। ऐसे कठिन समय में अनेक मकान मालिकों ने अपने किराएदारों के ऐसे आग्रह पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया है। चूंकि निकट समय में स्कूलों के खुलने की संभावना नहीं है और बहुत से कार्यालय वर्क फ्रॉम होम का विकल्प दे रहे हैं, लिहाजा आप भी अपने घर लखनऊ लौट सकते हैं, जहां आपको परिवार की मदद मिल सकती है। यदि वहां आपको अपने अभिभावकों के साथ रहना हो, तो आप उन्हें कुछ रकम किराए के बतौर भी दे सकते हैं, यह दिल्ली से कम ही होगी। अभी जरूरत है, अपने खर्चों में कटौती करने की।
किराए का अर्थशास्त्र
- मकान किराया मासिक आय से 20 फीसदी अधिक न हो।
- ऐसे किसी अनुबंध पर हस्ताक्षर न करें, जिसमें हर वर्ष के अंत में स्वत: किराया बढ़ जाए।
- यदि आपके बच्चों का स्कूल और आपका दफ्तर तथा बाजार वगैरह नजदीक हो, तो कुछ अधिक किराया देना व्यावहारिक होगा।
- मकान के किराए के साथ आपको बिजली, मेंटेनेंस तथा मेड के वेतन पर भी विचार करना चाहिए।