2019 लोकसभा चुनाव की शुरुआत हो चुकी है। भाजपा की ओर से जारी किए गए घोषणापत्र में हर गरीब परिवार को पक्का मकान उपलब्ध कराए जाने की बात कही गई है। सरकार की भले ही रियल एस्टेट को मजबूत बनाने की योजना हो। लेकिन ऐनारॉक प्रॉपर्टीज की रिपोर्ट के अनुसार भारत के रियल एस्टेट सेक्टर की हालत एकदम खराब है। देशभर के सात प्रमुख शहरों में 4,51,750 करोड़ रुपये की करीब 5.6 लाख आवासीय इकाइयों का निर्माण समय से पीछे चल रहा है। प्रॉपर्टी कंसल्टेंट एनारॉक का कहना है कि मांग में कमी और डेवलपर्स की ओर से पूंजी का इस्तेमाल दूसरे कार्यों में करने से धन की कमी के कारण परियोजनाएं पूरी करने में देरी हो रही है।
रिपोर्ट की मानें तो घरों की बिक्री भी पिछले 5 वर्षों में 28 फीसदी की दर से घटी है। वर्ष 2014 में जहां 3.43 लाख घरों की बिक्री हुई, वहीं पिछले साल 2.48 लाख घर बिके। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि देश के सात प्रमुख शहरों में पिछले पांच साल के दौरान घरों के दाम में 7 फीसदी का इजाफा हुआ है, जबकि इस दौरान इनकी मांग 28 प्रतिशत घटी है। इसी तरह घरों की आपूर्ति में इस समय अंतराल में 64 फीसदी की गिरावट आई है।
एक ओर जहां सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना को बढ़ावा दे रही है, वहीं एनारॉक की रिपोर्ट मानें तो प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत सस्ते आवासीय परियोजना की रफ्तार सुस्त है। इस योजना के तहत मंजूर किए गए 79 लाख घरों में से अब तक सिर्फ 39 फीसदी घरों का निर्माण पूरा हुआ है। एनसीआर में प्रोजेक्ट पूरा कराने की दिशा में नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कार्पोरेशन का आगे आना एक बड़ी पहल है, जिसका असर दिख सकता है। अगर सरकार की ये योजना 50 फीसदी प्रोजेक्ट्स भी हाथ में ले ले तो बड़े पैमाने पर एलआईजी और ईडब्ल्यूएस प्रोजेक्ट्स पूरे होंगे और रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
एनारॉक के आंकड़ों के मुताबिक, देरी से चल रहीं आवासीय इकाइयों में एमएमआर और एनसीआर की हिस्सेदारी 72 फीसदी है। एमएमआर में 2,17,550 करोड़ रुपये के 1,92,100 अपार्टमेंट और एनसीआर में 1,31,460 करोड़ रुपये की 2,10,200 आवासीय इकाइयां फंसी हुई हैं।
विलंब के कारण फंसे मकानों की संख्या में दक्षिण भारत के शहरों बंगलूरू, चेन्नई और हैदराबाद की हिस्सेदारी 10 फीसदी है। इनकी कीमत 41,770 करोड़ रुपये है।
पिछले पांच सालों में दिल्ली-एनसीआर में फ्लैटों का औसत साइज 16 फीसदी तक घट गया है। वहीं 40 लाख रुपये तक की कीमत वाले मकानों के आकार में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज हुई है। साल 2014 में फ्लैटों का औसत साइज 1485 वर्गफीट था, जो 2018-19 में 1250 वर्गफीट तक दर्ज किया गया।
पुरी ने कहा कि ‘यहां मुर्गी पहले आई या अंडा’ जैसी स्थिति बन गई है। मकान खरीदारों ने देरी के कारण बिल्डरों को पूंजी देना बंद कर दिया है। बिल्डर चाहते हैं कि ग्राहक पहले पैसा दें ताकि काम पूरा हो सके। देरी के कारण परियोजनाओं की लागत बढ़ जाती है, जो पूंजी की कमी को और बढ़ा देती है।
रेरा लागू होने से पहले कई बिल्डरों ने बिना अनुमति के ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट लांच कर दिए, जिस कारण उनकी परियोजनाएं अटक गईं। उन्होंने कहा कि इनसॉल्वेंसी एंड बैकरप्सी कोड में संशोधन और बैंकों एवं लेनदारों के बराबर अधिकार देकर सरकार ने खरीदारों को हितों की रक्षा की है।
प्रॉपर्टी कंसल्टेंट ने कहा कि आगामी आम चुनावों के बाद जो भी सरकार सत्ता में आती है, उसे रियल एस्टेट क्षेत्र की बेहतरी और फंसी आवासीय परियोजनाओं के लिए काफी कार्य करना होगा। फंसी परियोजनाओं के कारण निर्माणाधीन संपत्ती खरीदने को लेकर खरीदारों में विश्वास कम हुआ है, जिसे सरकार को पुनर्जीवित करना होगा।
अगर खरीदार निर्माणाधीन संपत्तियों की खरीदारी बंद कर देते हैं तो बिल्डरों के पास परियोजना निर्माण के लिए बाहरी स्रोतों से धन प्राप्त करना अधिक चुनौतीपूर्ण होगा।
हालांकि 2019 में मकानों की बिक्री में तेजी आने की उम्मीद है। इसके साथ ही आपको बता दें कि संपत्ति सलाहकार फर्म सीबीआरई की रिपोर्ट के अनुसार आवास, कार्यालय, खुदरा और लॉजिस्टिक्स सहित सभी क्षेत्रों में कुल मिलाकर 2019 में कुल 20 करोड़ वर्ग फीट जगह और जुड़ जाएगी। प्रौद्योगिकी, मांग-आपूर्ति स्थिति, कारोबार सुगमता रैकिंग में सुधार और जीएसटी, रेरा समेत अन्य सुधारों के प्रभाव 2019 में भारतीय रियल एस्टेट बाजार पर होगा। इस संदर्भ में सीबीआरई ने कहा कि इसके चलते नए मकानों की आपूर्ति में सालाना करीब 15 फीसदी और बिक्री में 13 फीसदी की वृद्धि होने की उम्मीद है।