देश में कारोबार करने को इच्छुक किसी भी कंपनी को कंपनी एक्ट 1956 के अंतर्गत अपना पंजीयन कराना जरूरी है। रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने प्रत्येक गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को बिजनेस करने के लिए दिशानिर्देश तय कर रखें हैं।
रिजर्व बैंक ने लोन कंपनियों, निवेश कंपनियों, एसेट फाइनेंस कंपनियों व अन्य गैर बैंकिंग कंपनियों के लिए भी कायदे कानून तय कर रखे हैं।
इसके अलावा, सूचीबद्ध कंपनियां, म्यूचुअल फंड और कलेक्टिव निवेश स्कीम (सीआईएस) का नियमन भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड (सेबी) करता है। सीआईएस स्कीम के जरिए निवेशकों से जुटाई गई राशि का निवेश प्लांटेशन और रीयल एस्टेट वेंचर्स में ही किया जा सकता है।
कंपनियों के लिए जमा के नियम
कोई भी कंपनी छह माह से कम या 36 माह से अधिक के बाद भुगतान वाली किसी भी डिपाजिट को न तो स्वीकार कर सकती है न ही रिन्यू। कंपनियां मान्य दर से अधिक ब्याज की पेशकश नहीं कर सकती है, जोकि समय-समय पर बदलता रहता है।
कोई भी कंपनी एक साल की जमा पर 1 फीसदी, दो साल की जमा पर 1.5 फीसदी और तीन साल के जमा पर 2 फीसदी से अधिक ब्रोकरेज का भुगतान एजेंट को नहीं कर सकती हैं।
एनबीएफसी के लिए नियम-कानून
प्रत्येक गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) का रिजर्व बैंक के यहां पंजीकृत और पब्लिक से जमा स्वीकार करने की विशेष अनुमति होनी जरूरी है।
पब्लिक से जमा लेने वाली एनबीएफसी को मान्यता प्राप्त रेटिंग एजेंसी से कम से कम एक इनवेस्टमेंट ग्रेड क्रेडिट हासिल होना चाहिए। एनबीएफसी समय-समय पर रिजर्व बैंक द्वारा मान्य ब्याज दरों से अधिक ब्याज की पेशकश नहीं कर सकती हैं। कोई भी एनबीएफसी 12 माह से कम और 60 माह से अधिक का जमा स्वीकार नहीं कर सकती है।
पोंजी स्कीम के जरिये ठगी करने वाली कंपनियां बैंक एफडी से लेकर, तरजीही (वरीय) शेयर, बांड या डिबेंचर जैसे कई ऑफर लोगों के सामने पेश करती हैं। इन स्कीमों में सामान्य से अधिक रिटर्न का ऑफर होता है, जिसके झांसे में निवेशक आसानी से आ जाते हैं। ऐसे में इन कंपनियों या पोंजी स्कीमों से बचने के लिए यह जान लेना जरूरी है कि देश के कायदे कानून क्या कहते हैं।