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यूलिप के नए ढांचे में ग्राहकों के हितों का पूरा ख्याल

Tue, 29 Jan 2013 06:47 PM IST
नई दिल्ली/नीरव पंचमातिया
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बाजार नियामक सेबी और बीमा नियामक इरडा के बीच असल विवाद यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (यूलिप) को लेकर था। बीमा कंपनियां 10-15 साल की निवेश अवधि वाले यूलिप को 3 साल की अवधि वाली बीमा योजनाओं के रूप में बेच रहीं थीं, जबकि 3 साल की अवधि यूलिप में न्यूनतम निवेश की थी। बीमा कंपनियों के लिए यूलिप को 10-15 साल का प्लान बताकर बेचने की बजाय 3 साल का इनवेस्टमेंट प्लान बताकर बेचना ज्यादा आसान था।
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साथ ही बीमा कंपनियों ने 50-60 साल की उम्र वाले निवेशकों को बड़ी संख्या में पेंशन प्लान बेचे, जबकि पेंशन प्लान खासतौर से युवाओं के लिए उपयोगी है और इसमें निवेश की अवधि कम से कम 10 साल होनी चाहिए। बीमा कंपनियों और एजेंटों की भ्रामक जानकारी की वजह से बड़ी संख्या में निवेशकों ने पैसे गंवाए और यूलिप का नाम भी बदनाम हुआ। इन सब घटनाओं को देखते हुए सेबी ने कुछ समय के लिए कुछ बीमा कंपनियों के यूलिप बेचने पर रोक लगा दी और यूलिप को लेकर नए दिशा-निर्देश पेश किए।

सेबी ने यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान की न्यूनतम लॉक इन अवधि को 3 साल से बढ़ाकर 5 साल कर दिया और सिंगल प्रीमियम पॉलिसी पर रोक लगा दी। साथ ही न्यूनतम प्रीमियम भुगतान अवधि को बढ़ाकर 5 बार कर दिया। बाजार नियामक संस्था सेबी ने न्यूनतम बीमित राशि में भी बढ़ोतरी की।
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इसके तहत 45 साल से कम उम्र वाले व्यक्ति को 10 गुना सम एश्योर्ड (बीमित राशि) और 45 साल से ज्यादा उम्र वाले पॉलिसीधारक को 7 गुनी बीमित राशि देने का प्रावधान कर दिया गया। सेबी के प्रावधानों के मुताबिक किसी भी सूरत में बीमित राशि दिए गए कुल प्रीमियम के 105 फीसदी से कम नहीं होनी चाहिए, इसमें टॉप अप्स भी शामिल हैं।

वहीं, बीमा नियामक इरडा ने पॉलिसी बंद होने के साल और सालाना प्रीमियम के आधार पर सरेंडर चार्ज की एक सीमा तय कर दी। ऐसे में अगर कोई पॉलिसीधारक शुरुआती समय में ही अपनी पॉलिसी सरेंडर करना चाहता है, तो उसे बहुत थोड़ी पेनाल्टी देनी पड़ेगी।

नए प्रावधानों के तहत यूनिट लिंक्ड पेंशन प्रोडक्ट्स में पार्शियल विदड्रा (थोड़े-थोड़े करके पैसे निकालने) की सहूलियत को खत्म कर दिया गया। मैच्योरिटी पर कुल फंड के अधिकतम एक तिहाई को लिया जा सकता है, जबकि बाकी का इस्तेमाल एन्युटीज खरीदने में किया जाना चाहिए।

इरडा ने यह शर्त भी जोड़ दी है कि सभी यूनिट लिंक्ड पेंशन प्रोडक्ट्स के लिए न्यूनतम गारंटेड रिटर्न देना जरूरी है। जहां तक न्यूनतम गारंटेड रिटर्न की बात यह तो इरडा इसे समय पर तय करेगा। यूलिप पर लगने वाले कुल चार्ज पांच साल की लॉक-इन अवधि में होने चाहिए। सेबी और इरडा की सम्मिलित कोशिश से यूलिप का नया ढांचा तैयार हुआ है, जिसमें निवेशकों के हितों का पूरा ध्यान रखा गया है।

जहां तक नए प्रावधानों के बाद लांच होने वाले पेंशन प्लान की बात है तो न्यूनतम गारंटेड रिटर्न की बाध्यता के कारण ज्यादा पेंशन प्लान लांच नहीं हुए हैं। यह अचरच की बात है कि जब न्यूनतम गारंटेड रिटर्न की बाध्यता नहीं थी, तो भारी भरकम रिटर्न के सपने दिखाकर बड़ी संख्या में इन प्लान को बेचा गया। हालांकि, जब बीमा कंपनियों के लिए गारंटेड रिटर्न की शर्त जोड़ दी गई, तो ज्यादातर योजनाओं को वापस ले लिया गया।

नॉन पेंशन कैटेगरी में नई यूलिप योजनाएं निश्चित तौर पर पुराने यूलिप से कहीं बेहतर हैं। नए यूलिप को ज्यादा बेहतर तरीके से तैयार किया गया है और ये पहले की तुलना में सस्ते हैं। जहां यूलिप के पुराने अवतार में ज्यादा ऊंचे खर्च और कमीशन शामिल था। वहीं, नए यूलिप में खर्चे और कमीशन दोनों कम हैं लेकिन म्यूचुअल फंड पर लगने वाले बेहद कम एक्सपेंस रेशियो और कमीशन की तुलना में यह कहीं ज्यादा है।

हालांकि, मेरी निवेशकों को यही सलाह होगी कि अगर वे अपनी बीमा संबंधी जरूरतों के लिए प्लान लेना चाहते हैं, तो टर्म इंश्योरेंस खरीदें और निवेश संबंधी जरूरतों के लिए एक बेहतरीन इक्विटी डायवर्सिफाइड म्यूचुअल फंड में निवेश करें। बीमा और निवेश के मामले में इस मेल का कोई तोड़ नहीं है।

यूलिप या दूसरी बीमा योजनाओं में निवेश करने से पहले निवेशकों को पर्याप्त रिसर्च करनी चाहिए। इसके बाद ही कोई फैसला लेना चाहिए। अगर आप अपना इनवेस्टमेंट पोर्टफोलियो तैयार करने में किसी अच्छे फाइनेंशियल प्लानर की मदद लें, तो ज्यादा बेहतर होगा। हर निवेशक के लिए यह अहम है कि उसके दिमाग में अपने वित्तीय लक्ष्य का स्पष्ट खाका हो।

खिंच गई थी सेबी-इरडा में तलवार
अप्रैल 2010 में बाजार नियामक संस्था सेबी ने 14 जीवन बीमा कंपनियों के यूनिट लिंक्ड प्लान (यूलिप) बेचकर पैसे जुटाने पर रोक लगा दी। हालांकि इसमें एलआईसी शामिल नहीं थी। यह मामला उस समय और गर्मा गया, जब इरडा ने बीमा कंपनियों से कहा कि वे सेबी के आदेश को तवज्जो न दें और यूलिप बेचना जारी रखें।

दोनों नियामकों के बीच असल लड़ाई यह थी कि यूलिप पर आखिर किसका नियंत्रण हो। सेबी का कहना था चूंकि यूनिट लिंक्ड प्लान का ढांचा बहुत हद तक म्यूचुअल फंड से मिलता है और इसमें सीधे शेयरों में निवेश किया जाता है। इसलिए यूलिप उसके नियंत्रण में आना चाहिए।

वहीं, इरडा की दलील थी कि बाजार से जुड़ा होने पर भी यूलिप मूलत: एक बीमा उत्पाद ही है। अत: इसका नियंत्रण पूरी उसके पास ही रहना चाहिए। इस विवाद का सीधा असर बीमा कंपनियों की आमदनी पर पड़ा, क्योंकि इंश्योरेंस कंपनियों की आमदनी में ऐसी योजनाओं की हिस्सेदारी करीब 70-80 फीसदी तक थी। यूलिप विवाद को लेकर वित्त मंत्रालय के अधिकारियों, सेबी और इरडा के चेयरमैन के बीच बैठक हुई, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

केंद्रीय कैबिनेट ने 17 जून 2010 को सिक्योरिटीज एंड इंश्योरेंस लॉ आर्डिनेंस 2010 को मंजूरी दी। इसके बाद 18 जून 2010 को आरबीआई एक्ट, इंश्योरेंस एक्ट, सेबी एक्ट और सिक्योरिटीज कॉन्ट्रैक्ट रेगुलेशन एक्ट में संशोधन किया गया और यह साफ किया गया कि यूलिप पर इरडा का ही नियंत्रण होगा। 19 जून 2010 को भारत सरकार ने इस विवाद का पूरी तरह खात्मा यह कहते हुए किया कि यूलिप का नियंत्रण इरडा के हाथ में ही रहेगा।

इसके साथ ही यह भी प्रावधान किया गया अगर किसी योजना में बीमा का हिस्सा शामिल है, तो उसका नियमन (रेग्युलेशन) बीमा नियामक संस्था इरडा के पास होगा। सरकार ने कहा इरडा और पेंशन नियामक पीएफआरडीए द्वारा मंजूर किए गए कोई उत्पाद सेबी के नियंत्रण में नहीं आएंगे।
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