‘बीमा आग्रह की वस्तु है’, यह जुमला बीमा के जुड़े सभी विवरणिकाओं पर कानूनी रूप से जरूर लिखा होता है। इसका अर्थ है कि बीमा खरीदार अपने बीमा के लिए बीमा कंपनी से आग्रह करे और बीमा कंपनी का प्रतिनिधि उसकी जरूरत के हिसाब से उसे पॉलिसी का सुझाव दे। इसलिए यह भी कहा जाता है बीमा खरीदी जानी चाहिए न कि बेची।
प्रीमियम भरने का ग्रेस पीरियड
सालाना प्रीमियम में नियत तारीख से 30 दिनों तक, जिसे ग्रेस पीरियड कहते हैं, बिना किसी पेनाल्टी के प्रीमियम का भुगतान किया जा सकता है, जबकि तिमाही प्रीमियम के मामले में यह अवधि 15 दिनों की होती है। इस अवधि के दौरान आपकी पॉलिसी चालू रहती है, जबकि ग्रेस पीरियड के भीतर प्रीमियम का भुगतान न करने से पॉलिसी लैप्स हो जाती है और लैप्स पॉलिसी पर आप किसी तरह का क्लेम नहीं कर सकते।
पुरानी पॉलिसियों को कैसे करें चालू
अगर आपकी पॉलिसी लैप्स हुए तीन-चार साल भी बीत चुके हैं और आप उसे चालू करवाना चाहते हैं, तो ऐसा किया जा सकता है। जीवन बीमा पॉलिसी के अंतिम प्रीमियम का भुगतान न करने की तारीख से पांच वर्षों के भीतर फिर से चालू कराया जा सकता है। इसके लिए आपको बीमा कंपनी से संपर्क करना होगा, बीमा कंपनी द्वारा अधिकृत डॉक्टर से स्वास्थ्य ठीक होने का प्रमाणपत्र लेकर विलंब से प्रीमियम भुगतान करने की पेनाल्टी के साथ बकाया पूरे प्रीमियम का भुगतान करना होगा।
पुरानी पॉलिसी को चालू कराने के लाभ
लैप्स पॉलिसी को चालू कराने के मामले में सबसे अहम सवाल यह उठता है कि इसे फिर से चालू कराने से क्या फायदा होगा? इसमें सबसे बड़ा लाभ यह होता है आपको आगे के प्रीमियमों का भुगतान उस उम्र के हिसाब से ही करना होगा जिस उम्र में पॉलिसी ली गई थी, न कि मौजूदा उम्र के हिसाब से। जाहिर है ऐसे में आपको कम प्रीमियम चुकाना होगा।
दूसरा फायदा यह है कि पॉलिसी लेते वक्त आपको बीमे के अंतर्गत जिन लाभों की गारंटी दी गई थी वह मिलती रहेगी। तीसरा फायदा यह होगा कि पेनाल्टी के अलावा वह बकाया प्रीमियम के तौर पर जितनी राशि का भुगतान करेंगे उस पर आयकर अधिनियम की धारा 80 सी के तहत छूट मिलेगी।
ईसीएस है भुलक्कड़पन का इलाज
भुलक्कड़पन या लापरवाही के चलते बीमा पॉलिसी को लैप्स होने से बचाने का सबसे सरल और कारगर उपाय है। ईसीएस यानी इलेक्ट्रॉनिक क्लियरिंग सर्विस। इसके जरिए आप समय पर अपने प्रीमियम का भुगतान करना सुनिश्चित कर सकते हैं।
ईसीएस चालू हो जाने पर पॉलिसीधारक के बैंक द्वारा पूर्व निर्धारित तारीख को प्रीमियम स्वत: ही काट कर बीमाकर्ता को भेज दिया जाता है। यह एक झंझट रहित तरीका है, जो बीमाधारक को न सिर्फ प्रीमियम भरने की चिंता से दूर रखता है, बल्कि उसके प्रीमियम भुगतानों का रिकॉर्ड भी रखता है। इसमें आपको प्रीमियम भरने के लिए न तो कोई फिजिकल ट्रांजेक्शन करना होता है और न ही बैंक या बीमा कंपनी के ऑफिस में जाने की जरूरत होती है।
ईसीएस का उपयोग करते हुए आप इसकी विश्वसनीयता और अपनी जानकारियों की गोपनीयता के बारे में भी पूरी तरह निश्चिंत रह सकते हैं, क्योंकि आरबीआई द्वारा ईसीएस की सख्ती से निगरानी की जाती है। पॉलिसीधारक के खाते और पॉलिसी संबंधी ब्यौरे को पूरी तरह गोपनीय रखा जाता है। बीमा प्रीमियम के लिए ईसीएस को सब्सक्राइब करना काफी आसान है और इसके लिए बैंक या बीमाकर्ता द्वारा कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाता।
क्या है ईसीएस की प्रक्रिया
ईसीएस के जरिए प्रीमियम भुगतान के लिए पॉलिसीधारक को ईसीएस मैंडेट फॉर्म भरना होता है, जिसे ऑनलाइन या बीमा संस्थान से खरीदा जा सकता है। यह फॉर्म भर एक निरस्त चेक (कैंसिल्ड चेक) के साथ बीमा कंपनी के पास जमा कनना होता है। बाकी की औपचारिकताएं बीमा कंपनी बैंक के साथ संपर्क करके स्वयं पूरी करती है।
ईसीएस सुविधा चालू हो जाने और पॉलिसीधारक के खाते से प्रीमियम की राशि कटना शुरू हो जाने के बाद, ग्राहक को बीमा कंपनी से प्राप्ति संबंधी सूचना मिलती है। ईसीएस सुविधा लेने के बाद आपको बस इस बात का ध्यान रखना होता है कि आपके बैंक खाते में आपके प्रीमियम भर की राशि मौजूद रहे।
ईसीएस चालू करवाने के बाद यदि ग्राहक पॉलिसी को बंद करना चाहता है या ईसीएस को बंद करा कर भुगतान के अन्य तरीके अपनाना चाहता है, तो वह बीमा कंपनी के साथ-साथ बैंक को एक पत्र भेज कर ऐसा कर सकता है। ईसीएस सुविधा वर्तमान में चुनिंदा शहरों में उपलब्ध है, जो प्रत्येक बीमा कंपनी के लिए अलग है। आमतौर पर, अधिकांश महानगरों और टियर-2 शहरों में यह सुविधा उपलब्ध है।