मंदी का असर कारोबार, अर्थव्यवस्था के साथ-साथ लोगों की रिटायरमेंट बचत प्लानिंग पर भी पड़ा है। एचएसबीसी की ग्लोबल द फ्यूचर ऑफ रिटायरमेंट स्टडी में यह जानकारी सामने आई है कि मंदी ने लोगों के रिटायरमेंट बचत का बजट गड़बड़ा दिया है। देश में 10 में से 9 लोगों का यह मानना है कि मंदी से रिटायरमेंट के लिए बचत करने की उनकी क्षमता काफी प्रभावित हुई है।
एचएसबीसी द्वारा कराए गए इस अध्ययन की इंडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्थिक मंदी के चलते देश के करीब 29 फीसदी नौकरीपेशा लोग रिटायरमेंट बचत को लेकर लगभग कोई तैयारी नहीं कर रहे हैं, जबकि वैश्विक स्तर पर ऐसे लोगों की संख्या 56 फीसदी है। दुनिया भर में 18 फीसदी नौकरीपेशा लोगों की तुलना में 10 फीसदी भारतीय कामकाजी लोगों का मानना है कि वह इसकी भरपाई कभी नहीं कर पाएंगे।
15 बाजारों के 15,000 उपभोक्ताओं पर आधारित सर्वेक्षण का लक्ष्य लोगों की रिटायरमेंट आवश्यकताओं और इसकी तैयारी का पता लगाना है। रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत में कामकाजी आयु के लोगों में 90 फीसदी कर्ज में फंसने, नौकरी गवांने या आर्थिक मंदी जैसी घटनाओं से प्रभावित हुए हैं। यह ऐसी घटनाएं हैं, जिसका असर सबसे ज्यादा होता है और औसतन चार साल के लिए रिटायरमेंट बचत रुक जाती है।
एचएसबीसी इंडिया में रिटेल बैंकिंग व वेल्थ मैनेजमेंट के प्रमुख गणेश भारद्वाज का कहना है कि बगैर बचत के एक या दो साल का भी असर भी रिटायरमेंट के बाद की आपकी कमाई पर काफी ज्यादा हो सकता है। पहली बार जब आर्थिक मंदी आई थी और कई लोगों ने बचत कम या बंद कर दी थी।
हरेक को उम्मीद थी कि समस्या टल जाएगी पर आज की बदलती अर्थव्यवस्था और सामाजिक प्रवृत्तियां ऐसी हैं कि लोगों को अपनी योजना के बारे में अलग से सोचने और तैयारी करने की आवश्यकता है। अगर आपकी कोई वित्तीय योजना हो (अनौपचारिक या औपचारिक हो तो बेहतर) तो रिटायरमेंट के लिए औसत बचत ज्यादा होगी। अध्ययन से पता चला कि भारत में एक चौथाई लोग रिटायरमेंट के लिए बचत करने में सक्षम थे लेकिन आर्थिक मंदी से वह बेहद प्रभावित हुए हैं।