एफडी में जोखिम
सरसरी तौर पर एफडी में निवेश में कोई जोखिम नजर नहीं आता। लेकिन एफडी से मिलने वाले वास्तविक रिटर्न का गहराई से आकलन करने पर आपको आश्चर्य होता है कि एफडी से मिले रिटर्न के तौर पर वस्तुत: ज्यादा कुछ नहीं मिलता। एफडी की ब्याज दर और मुद्रास्फीति की मौजूदा दर का अंतर ही वास्तविक रिटर्न होता है। यानी जब मुद्रास्फीति की दर पांच फीसदी और एफडी की दर 6.7 फीसदी हो, तो बचत पर मिला वास्तविक रिटर्न लगभग दो फीसदी ही है। जोखिम उठाने में अनुच्छिक निवेशकों के लिए एफडी का सबसे बड़ा आकर्षण इसके ब्याज की गारंटी है। लेकिन ऐसे लोग इस तथ्य की अनदेखी कर देते हैं कि एक अवधि के बाद मुद्रास्फीति के अलावा टैक्स के कारण भी उनकी बचत राशि सिकुड़ जाती है।
जैसे मान लीजिए की मुद्रास्फीति की मौजूदा दर घटाने के बाद दो साल के आपके फिक्स्ड डिपॉजिट का वास्तविक रिटर्न दो फीसदी है। अगर आप इसमें 10 फीसदी टैक्स जोड़ते हैं (10 फीसदी टैक्स दायरे में आने वाले करदाताओं के लिए), तो आपका वास्तविक रिटर्न और कम होकर 1.8 फीसदी रह जाएगा। यहां मुद्रास्फीति की दर को औसत रूप में रखा गया है, जबकि बहुत सी वस्तुएं और सेवाएं ऐसी हैं, जिसमें वृद्धि भले ही साफ-साफ दिखाई नहीं देती, लेकिन उनकी दर ऊंची होती है। ईंधन के मूल्य में वृद्धि मुद्रास्फीति या शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवा की बढ़ी कीमत की तुलना में अधिक होती है।
अपनी उम्र को देखते हुए संजय को म्यूचुअल फंड में निवेश करने के बारे में सोचना चाहिए। म्यूचुअल फंड में कई तरह के निवेश योजनाएं हैं। जैसे लिक्विड फंड बैंक के बचत खाते में निवेश का विकल्प है- इसमें ब्याज मिलने की गारंटी नहीं है, पर इससे टैक्स जिम्मेदारी कम होती है और रिटर्न बैंक के बचत खाते से मिलने वाले रिटर्न के बराबर होता है। अगर कोई टैक्स बचाना चाहता है, तो तीन साल के लॉक-इन वाली इक्विटी लिंकड सेविंग स्कीम (ईएलएसएस) उसके लिए शानदार विकल्प है। सारा पैसा एफडी में रख देना लंबी अवधि में निवेश के लिए ठीक नहीं है, यह आर्थिल लक्ष्य में भी मददगार नहीं होता। निवेश के दूसरे विकल्पों पर विचार ना करना, जिनका रिटर्न भी बेहतर है और जिससे टैक्स भी बचता है, अवसरों को खोना भी है।