पिछले एक साल में पीएमसी और येस बैंकों में हुए घोटालों तथा खाताधारकों का पैसे निकालने के लिए बैंक में भीड़ लगाने तथा प्रदर्शन करने के दृश्यों के बाद से ही 53 वर्षीय सतिंदर सिंह बैंक में जमा अपने रुपयों के बारे में बेहद चिंतित हैं। वह आश्वस्त होना चाहते हैं कि बैंक में जमा उनके रुपये सुरक्षित हैं या नहीं। पंचकुला के सतिंदर सिंह के चिंतित होने की वजह है।
पिछले साल अपने एक रिश्तेदार को हुई परेशानी के वह गवाह हैं, जिसने अपनी पूरी जमा-पूंजी पीएमसी बैंक में जमा की थी, पर घोटाले के बाद निकासी की सीमा तय होने से वह बैंक से रुपये नहीं निकाल पा रहे थे। सतिंदर सिंह का सार्वजनिक क्षेत्र के एक बैंक में लॉकर के अलावा तीन खाते और छह फिक्स्ड डिपॉजिट हैं। चूंकि कोविड-19 के कारण उनका बैंक में जाना कम हो गया है, ऐसे में, अपनी जमा-पूंजी की सुरक्षा के प्रति उनका चिंतित होना स्वाभाविक है।
बैंक के ब्रांच मैनेजर ने उन्हें आश्वस्त भी किया है, पर उनकी चिंता कम नहीं हो रही। रिजर्व बैंक के मुताबिक, भारत में अलग-अलग तरह के बैंक हैं, जैसे-सार्वजनिक बैंक, निजी बैंक, विदेशी बैंक, कई राज्यव्यापी को-ऑपरेटिव बैंक तथा ग्रामीण बैंक।
वैसे तो देश में चल रहे तमाम बैंक रिजर्व बैंक के अंतर्गत आते हैं और उसके दिशा-निर्देश से चालित होते हैं, पर जमाकर्ताओं के धन के प्रबंधन और रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशों के पालन के मामले में को-ऑपरेटिव बैंक कम पारदर्शिता का परिचय देते हैं।
चूंकि ज्यादातर को-ऑपरेटिव बैंक छोटी जगहों में होते हैं, ऐसे में, वे धन के प्रबंधन के सख्त मानकों का पालन नहीं करते। इसके अलावा को-ऑपरेटिव के मुखिया ही इन बैंकों का संचालन करते हैं और ऐसे लोग अपने हितों और बैंक के हित में कोई फर्क नहीं करते।
बैंक सुरक्षा
कहने को इस देश में जितने भी बैंक हैं, सभी सुरक्षित हैं, क्योंकि बैंक के विफल होने के दुर्लभ उदाहरण ही सामने आते हैं। छोटे क्षेत्रीय और को-ऑपरेटिव बैंकों में जमाकर्ताओं की चिंता को देखते हुए वित्त मंत्री ने हाल ही में इन बैंकों को रिजर्व बैंक के अंतर्गत लाने का एलान किया।
हाल के महीनों में रिजर्व बैंक ने इन बैंकों की अनियमितताओं पर नजर रखने के लिए खास सक्रियता दिखाई है और उसने गोवा स्थित मापुसा को-ऑपरेटिव बैंक का लाइसेंस इस आधार पर रद्द कर दिया कि उसके पास न तो ज्यादा पूंजी ही थी और न उसके बेहतर आर्थिक प्रदर्शन की संभावना थी, जिसका बैंक के जमाकर्ताओं के हितों पर असर पड़ सकता था।
इसके अलावा केंद्रीय बैंक ने खराब वित्तीय स्थिति और तय मानक का पालन न करने के लिए 40 को-ऑपरेटिव बैंकों को निगरानी के दायरे में रखा है। समय-समय पर रिजर्व बैंक कुछ बैंकों को पीसीए (प्रॉम्ट करेक्टिव ऐक्शन) फ्रेमवर्क के दायरे में भी रखता है।
ऐसा उन बैंकों के साथ किया जाता है, जिनके पास कम पूंजी होती है। एक बार किसी बैंक को पीसीए के दायरे में रख दिया जाए, तो उसके द्वारा पैसे जमा करने या उधार देने पर प्रतिबंध रहता है। ऐसा तब तक चलता है, जब तक कि बैंक की स्थिति सुधर न जाए।
पिछले पांच साल में इलाहाबाद बैंक, यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, कॉरपोरेशन बैंक, आईडीबीआई बैंक, यूको बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, देना बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक पीसीए के दायरे में आए हैं। इनमें से कई बैंक अब पीसीए के दायरे से बाहर हैं, इसके बावजूद यह बात पूरी तरह सच नहीं है कि बैंकों में पैसा रखना सुरक्षित है।
डिपॉजिट इंश्योरेंस
सभी वाणिज्यिक बैंक, जिनमें इस देश में सक्रिय विदेशी बैंकों की शाखाएं भी शामिल हैं, स्थानीय बैंक तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक-सभी डीआईसीजीसी (डिपॉजिट इंश्योरेंस ऐंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन) द्वारा बीमित होते हैं। इसका अर्थ यह है कि अगर किसी कारण से कोई बैंक फेल हो जाए, तो उसके खाताधारकों के पांच लाख रुपये नहीं डूबेंगे।
यानी अगर किसी बैंक में आपके दो लाख रुपये जमा हैं और बैंक बंद हो जाता है, तो आपको अपने रुपये मिलेंगे। खाताधारकों की बीमित राशि की सीमा इस साल की शुरुआत तक एक लाख रुपये थी, जिसे बढ़ाकर पांच लाख किया गया है। सतिंदर सिंह को बैंक में रुपये जमा करने में सतर्कता बरतनी चाहिए। उन्हें अपना जमा तीन-चार अलग-अलग बैंकों में रखना चाहिए।