फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सुरक्षित भविष्य में न लगे महंगाई की सेंध, इस तरह से करें अपनी वित्तीय प्लानिंग

Mon, 09 Jul 2018 10:12 AM IST
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला
विज्ञापन
महंगा
विज्ञापन

जब आप अपने से एक पीढ़ी पीछे के लोगों से बातचीत करते हैं, तो आप भले ही किसी भी दौर के क्यों न हों, अंत में यह चर्चा जरूर होती है कि बचपन से लेकर अब तक जिंदगी कैसे पूरी तरह बदल गई है। बदलाव के विभिन्न उदाहरण हमेशा एक ही बात पर आकर खत्म होते हैं कि पैसे की अब वो कीमत नहीं रह गई जो हुआ करती थी।

विज्ञापन


इस बातचीत की जड़ में कुछ और नहीं बल्कि महंगाई है। ये आंकड़े हर महीने सरकार द्वारा जारी किए जाते हैं और आम आदमी को भी इसके बारे में पता होता है।

योजना बनाते समय अनदेखी करते हैं महंगाई
महंगाई एक ऐसा आर्थिक शब्द है जिसे हम सभी रोजमर्रा के जीवन में अनुभव करते हैं। हालांकि, जब हम अपने भविष्य की जरूरतों की योजना बनाते हैं तो हम महंगाई के प्रभाव को अनदेखा कर देते हैं। हर महीने एक लाख रुपये कमाने वाले एक 23 वर्षीय व्यक्ति के लिए एक करोड़ रुपये की रिटायरमेंट पूंजी काफी बड़ी हो सकती है।

कई बार यह पूंजी जरूरत से अधिक भी लगती है। 22 वर्ष बाद वही व्यक्ति जब 45 साल का होगा, तो 10 फीसदी की औसत वृद्धि के साथ एक करोड़ रुपये सालाना कमा रहा होगा। तब क्या एक करोड़ रुपये की रिटायरेमेंट पूंजी पर्याप्त होगी? शायद नहीं।
विज्ञापन


महंगाई है क्या
आइए समझते हैं कि महंगाई क्या है? कीमतों में होने वाली सामान्य वृद्धि और पैसे की खरीद शक्ति में आने वाली गिरावट को महंगाई कहते हैं। भारत सरकार सीपीआई का आकलन करती है, जो सामान्यत: एक आम परिवार द्वारा उपयोग किए जाने वाले उत्पादों की कीमत के औसत मूल्यों के आधार पर मापी जाती है।

कभी आपने सोचा है कि महंगाई आपके निवेश का मूल्य क्यों घटा देती है? इसलिए क्योंकि महंगाई के चलते पैसे की खरीद क्षमता घटती जाती है। महंगाई के कारण आपकी बचत की वास्तविक कीमत लगातार घटती जाती है। इसलिए एक निवेश सलाहकार हमेशा यही कहता है कि उसकी दी गई सलाह महंगाई को मात दे सकती है।

विज्ञापन

आप महंगाई को कैसे हराएंगे

महंगाई की ताकत को कम ना आंके। इस दिशा में पहला कदम यह होगा कि आप अपने वित्तीय पोर्टफोलियो पर महंगाई के प्रभाव को कम करके आंकना बंद करें। जीवन में आगे चलकर आपके पास पैसे की कमी न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि आर्थिक योजना बनाते समय आप महंगाई का भी ध्यान रखें।

यह भी संभव है कि अनुमान के मुताबिक आपकी पूंजी संतोषजनक स्तर से बढ़ती नजर आए। इसके अलावा, यह ना समझें कि सभी तरह के खर्चों के लिए महंगाई एक जैसी रहेगी। शिक्षा की महंगाई विशेष रूप से भारत में उच्च शिक्षा के मामले में, पिछले एक दशक में 10 फीसदी से ज्यादा बढ़ी है।

वहीं इसके मुकाबले सीपीआई के अनुसार आंकी गई महंगाई दर 7 फीसदी के आसपास रही है। यही हाल चिकित्सा के बढ़ते खर्च का भी है। आपको अपनी प्रत्येक जरूरत पर महंगाई के असर को अलग-अलग मापना होगा।

वास्तविक रिटर्न पर ध्यान दें
ब्याज दरें सामान्यत: दो तरीके से व्यक्त की जाती हैं- वास्तविक एवं न्यूनतम दरें। न्यूनतम दरें वे कूपन दरें होती हैं जो कि आपके द्वारा खरीदे गए एफडी या बांड पर अंकित होती हैं। वहीं वास्तविक दर की गणना महंगाई और इनकम टैक्स को एडजस्ट करते हुए की जाती है।

अगर ब्याज दर महंगाई दर से कम हैं, तो आपके निवेश का मूल्य बढ़ने की बजाय आप अपने निवेश की खरीद शक्ति या वास्तविक मूल्य घटता हुआ देखेंगे। इसलिए आमदनी बढ़ने पर निवेश बढ़ाएं तथा अलग-अलग मदों में निवेश करें। पूरी बचत को एक ही जगह डालकर अपने पैसों को खतरे में न डालें।

समय-समय पर करें समीक्षा
आर्थिक सुरक्षा एक बेहतर आर्थिक योजना से हासिल होती है, जिसकी समीक्षा समय-समय पर की जानी चाहिए। आप जितनी जल्दी भविष्य के लिए बचत शुरू करेंगे उतना ही बेहतर होगा। हालांकि, यह तभी प्रभावशाली होगा, जब आप बढ़ती महंगाई के हिसाब से अपनी आर्थिक योजना में बदलाव करते रहें। यदि चक्रवृद्धि बढ़ोतरी को आठवां आश्चर्य माना जाता है, तो इसके उलट महंगाई भी इसी आश्चर्य का दूसरा पहलू है।

(प्रशांत त्रिपाठी, सीनियर डायरेक्टर एवं चीफ  फाइनेंशियल ऑफिसर, मैक्स लाइफ  इंश्योरेंस)
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें