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इक्विटी बाजार में निवेश का बेहतर मौका

Mon, 03 Dec 2012 08:25 AM IST
सुनील सिंघानिया (रिलायंस कैपिटल एसेट मैनेजमेंट)
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दीवाली से शुरू हुआ नया वित्तीय संवत बाजारों के लिए सकारात्मक संकेत लेकर आया है। निवेश के किसी भी वर्ग चाहें रीयल एस्टेट हो या सोना, एफडी हो या इक्विटी सभी से निवेशकों को अच्छे संकेत मिलने शुरू हो गए हैं। पिछले करीब दो महीने की बात की जाए तो घरेलू ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी हालात पहले के मुकाबले बेहतर दिख रहे हैं।
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हाल के कुछ दिनों में इक्विटी बाजार में आई तेजी से केंद्र सरकार भी खासा उत्साहित है। बाजार की सुधरती तस्वीर देख सरकार ने भी अपने विनिवेश कार्यक्रम की रफ्तार बढ़ा दी है। पिछले दिनों हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के इश्यू को उम्मीद से बेहतर मिले रिस्पांस ने सरकार के हौसले और बढ़ा दिए हैं। आने वाले कुछ दिनों में सरकार एनपीसीआईएल, एनएमडीसी, एनटीपीसी, ऑयल इंडिया और नाल्को में भी हिस्सेदारी बेचेगी।

यानी, कुल मिलाकर देखें और समझें तो सुधरते हालात यह बता रहे हैं कि इक्विटी बाजार में कदम रखने का यह एक बेहतर मौका है। निवेशक खासकर खुदरा निवेशक बाजार के इस बदले मिजाज से बेहतर रिटर्न हासिल करने की ओर कदम बढ़ा सकते हैं। बीता एक वर्ष इक्विटी बाजार के लिए काफी चुनौतीपूर्ण रहा। घरेलू ही नहीं बल्कि ग्लोबल निवेशकों में भी भ्रम, भय और अस्थिरता की स्थिति बनी रही।
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उतार-चढ़ाव भरे हालात में निवेशकों को नए-नए शब्दों से दो-चार होना पड़ा। मसलन- नीतिगत कमजोरी, वित्तीय पुनर्गठन, राजकोषीय दबाव जैसे भारी-भरकम शब्दों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। इन सभी से इक्विटी बाजार में भ्रम की स्थिति पैदा हुई, जिसके चलते निवेशकों ने बाजार से दूरी बना ली। लेकिन, अब इनमें से अधिकांश समस्याएं धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं और इसके साथ यह बात भी स्पष्ट हो गई कि इन सभी बातों का लंबे समय तक असर नहीं रहता है।

पिछले दो-तीन साल से घरेलू और ग्लोबल दोनों बाजारों से लगातार नकारात्मक खबरें ही सामने आ रही थीं। लेकिन, पिछले दो महीने की बात करें तो दोनों ही जगहों से सकारात्मक रुझान देखने में आए हैं। ग्लोबल स्तर पर जहां हर किसी की नजर इसी बात पर टिकी थी कि कुछ देश दिवालिया हो रहे हैं वही, घरेलू मोर्चे पर आर्थिक सुस्ती सहित नीतिगत कमजोरी ने नकारात्मक रुझानों को और गहरा कर दिया था। लेकिन, पिछले दिनों सरकार की ओर से एलपीजी के दाम बढ़ाने और तमाम विरोध के बावजूद उसे लागू करने सहित कुछ सख्त नीतिगत उपायों ने अर्थव्यवस्था में घरेलू और विदेशी निवेशकों का भरोसा फिर से बहाल किया है।

अच्छी रहेगी 2013-18 तक ग्रोथ
पूंजी बाजार के लिए 2003 से 2007 पांच वर्ष का समय सबसे शानदार रहा। जबकि, 2008 से 2012 की अवधि कंसॉलिडेशन की रही। वहीं, 2013 से 2018 का समय पूंजी बाजार की ग्रोथ के लिए बेहतर साबित हो सकता है।
पिछले साल के चुनौतीपूर्ण दौर में निवेशकों ने काफी फूंक-फूंक कर कदम रखा और सिर्फ बडे़ शेयरों में ही निवेश किया। यदि सुधार की गाड़ी दौड़ जाती है, तो हालात बेहतर हो जाएंगे। अन्यथा, जोखिम और गहरा जाने का भी खतरा है। मौजूदा परिदृश्य को देखें तो देश में निवेश का माहौल बेहतर बन रहा है। यदि अगले साल के मध्य में आम चुनाव होते हैं तो ही थोड़े समय के लिए सेंटीमेंट सुस्त पड़ सकता है।

भारतीय इक्विटी में मौका न गंवाएं
2012 में अब तक इक्विटी बाजार में करीब 20 फीसदी की तेजी आने के बाद यह सवाल और भी मौजूं हो गया है कि क्या इक्विटी में निवेश का यह बेहतर समय है। हमारा मानना है कि उभरते बाजार में निवेश करना अच्छा रहता है। यदि कोई कहे कि महज 20 फीसदी की तेजी के आधार पर इक्विटी बाजार का रुख नहीं करना चाहिए, तो हमारा मानना है कि ऐसे में निवेशक आने वाले दिनों में बाजार की संभावित तेजी के लाभ को गवां सकता है।

जैसे, वित्त वर्ष 2003 के आखिर तक लंबे समय से निचले स्तर पर रहे सेंसेक्स में जून 2013 के अंत तक महज एक तिमाही में 20 फीसदी से अधिक की तेजी आई। इससे अगले साढ़े चार साल में सेंसेक्स 470 फीसदी तक उछल गया। ऐसे में जो लोग 2013 की शुरुआती 20 फीसदी के रिटर्न को देखते हुए बाजार से दूर हो गए वह आगे के साल में मुनाफा कमाने के स्वर्णिम अवसर से चूक गए। इतिहास हमें अवगत कराता है कि बाजार का रिटर्न लीनियर नहीं है। यहां बहुत अधिक रिटर्न के अवसर हैं तो नुकसान के भी।

बेहतर प्रदर्शन के साथ तेजी से उभरता घरेलू बाजार
भारत दुनिया में निवेश के लिहाज से सबसे अनुकूल और बेहतर प्रदर्शन करने वाले बाजारों में से एक है। पूरे विश्व के निवेशकों की नजर भारत के घरेलू बाजार पर लगी है। एक तरफ जहां घरेलू निवेशक लगातार समझदार हो रहे हैं, वहीं लंबी अवधि को ध्यान में रखकर विदेशी निवेशकों का निवेश साल दर साल बढ़ रहा है। 2012 के मध्य नवंबर तक विदेशी निवेशकों ने पूंजी बाजार में 18.5 अरब डॉलर का निवेश किया। यानी, सकारात्मक सोच के साथ अपने बेहतर भविष्य के बारे में विचार करने का यह सुअवसर है।  
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आने वाले समय में सामने आ सकती हैं यह ग्लोबल चुनौतियां
--तेल की कीमतों को लेकर भौगोलिक राजनीतिक तनाव का बढ़ना।
--हाल में केंद्र सरकार की ओर से आर्थिक सुधार की दिशा में उठाए गए नीतिगत कदमों का रोलबैक या लागू न होना।
--देश में समय से पहले आम चुनाव का होना।
--राजकोषीय दबाव बढ़ने से अमेरिका में राजनीतिक गतिरोध के हालात पैदा होना।
--यूनान के अलावा अन्य यूरोपीय देशों में वित्तीय संकट का फिर से सामने आना।

अगले एक साल में संभावित बदलाव
--महंगाई दर गत तीन साल के निचले स्तर पर आ सकती है।
--मुद्रास्फीति घटने के साथ ही ब्याज दरों में कमी संभव।
--जीडीपी की वृद्धि दर इस साल के मुकाबले अगले साल अधिक रह सकती है।
--केंद्रीय बैंकों द्वारा दरों में नरमी का रुख बनाए रखने से ग्लोबल स्तर पर तरलता की स्थिति में सुधार आ सकता है।
--कारोबार में सुधार से अगले साल कॉरपोरेट मुनाफा बेहतर हो सकता है।
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