सरकारी बैंकों के कामकाज को सुधारने के लिए उनमें सरकार की हिस्सेदारी और दखलंदाजी कम करनी होगी। इसके बाद ही निजी बैंकों से बाजार में मुकाबला कर पाएंगे और सीएजी और सीवीसी जैसी संस्थाओं के नियंत्रण से भी बाहर हो पाएंगे। फिलहाल सरकारी बैंकों में सरकार की कम से कम 51 फीसदी हिस्सेदारी है। ये विचार नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार के हैं।
नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार का मानना है कि सरकारी बैंकों के कामकाज में सबसे बड़ी बाधा है, उन पर नान-परफार्मिंग एसेट्स का बढ़ता बोझ। इसे चुकाने में कर्जदाता नाकामयाब रहता है। यह जनता का पैसा है, इसलिए इस पर सरकार से ज्यादा नियंत्रण जनता का होना चाहिए।
सरकारी बैंकों पर बडे़ उद्योगों के कई लाख करोड़ के कर्ज बकाया हैं जिन्हें बैड लोन करार दे दिया गया है। इनमें से कई कर्ज सरकार या राजनीतिक दलों के दबाव में दे दिए जाते हैं। इनमें किंगफिशर एयरलाइन का ताजा उदाहरण है। डूबती हुई कंपनी होने के बावजूद आईडीबीआई बैंक ने विजय माल्या की कंपनी को सैकड़ों करोड़ रुपए का कर्ज दे दिया था।
राजीव कुमार का मानना है कि पीजे नायक कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक इन बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी को एक अलग होल्डिंग कंपनी के हवाले कर देना चाहिए। वह इसमें सरकार की हिस्सेदारी घटाकर बाजार से पैसे जुटाकर जनता की हिस्सेदारी बढ़ाएगी।
लेहमान से लेकर नोटबंदी तक पिछले 10 सालों में अर्थव्यवस्था में लाए बड़े बदलावों पर लिखी तमाल बंदोपाद्धयाय की किताब के विमोचन समारोह में नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने कहा कि, 'इस कंपनी के बोर्ड में कुछ सरकारी अधिकारी हो सकते हैं लेकिन इससे उन पर सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण खत्म हो जाएगा। इससे वे न सिर्फ सरकार के दबाव में बैड लोन देने से बचेंगे बल्कि उन पर सीएजी और सीवीसी जैसी सरकारी संस्थाओं का अंकुश खत्म हो जाएगा। अभी वे काफी फैसले इसी दबाव में नहीं ले पाते कि ये संस्थाएं उनके फैसलों की समीक्षा करेंगी। हालांकि इस निजीकरण के बावजूद वे रिजर्व बैंक की नीतियों के अनुसार ही चलने को बाध्य होंगे।'
राजीव कुमार सरकारी बैंकों को विदेशी बैंकों के हवाले करने के खिलाफ हैं। उनका कहना था कि फिलीपींस की राजधानी मनीला में नौ साल के अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने किसी देश की अर्थव्यवस्था पर विदेशी बैंकों के असर को बहुत करीब से देखा है।