वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद में सेवा कर असेसी के बंटवारे के मामले में निकाले गए फार्मूले पर केंद्र और राज्य सरकार वित्त मंत्रियों के बीच भले ही सहमति बन गई हो, लेकिन इस फार्मूले के विरोध में केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के अपने अधिकारी और कर्मचारी ने ही विरोध का झंडा थाम लिया है।
न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे वित्त मंत्रालय के अधिकारी व कर्मचारी
केंद्र सरकार के अप्रत्यक्ष कर विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के विभिन्न संगठनों ने सरकार को अपनी प्रतिक्रिया से अवगत भी करा दिया है। इसके साथ ही यह चेतावनी भी दे दी है कि यदि जेटली इसका समाधान नहीं निकालते तो वे न्यायालय का दरवाजा भी खटखटा सकते है।
उनका कहना है कि सरकार को जल्दबाजी में नई टैक्स व्यवस्था लागू नहीं करनी चाहिए। यदि ऐसा होता है जीएसटी को लागू करने में और देरी हो सकती है।
जीएसटी परिषद द्वारा लिया गया फैसला गैरकानूनी
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केंद्र सरकार के समूह ‘ख’ के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के संगठन ने दो दिन पहले ही वित्त मंत्री को एक पत्र लिख कर बीते 16 जनवरी को जीएसटी परिषद में लिये गए फैसलों को गैरकानूनी बताते हुए इसे बदलने को कहा है।
ऐसा नहीं करने पर संगठन इसे न्यायालय में चुनौती भी दे सकता है। अब अप्रत्यक्ष कर विभाग के समूह ‘क’ श्रेणी के अधिकारियों के संगठन ने भी जेटली से मिल कर इस बारे में अपना विरोध दर्ज कर दिया है।
अधिकारियों के संगठन ने सौंपा जेटली को पत्र
जीएसटी बिल
समूह ‘क’ अधिकारियों के संगठन के प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार को देर शाम वित्त मंत्री से मुलाकात कर एक पत्र सौंपा है, जिसकी प्रति का मुआयना अमर उजाला ने भी किया। इनकी प्रमुख शिकायत सेवा कर के 90 फीसदी असेसी को राज्य के हवाले करने संबंधी फैसले से है।
अधिकारियों का कहना है कि यदि ऐसा होता है तो केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर विभाग के पास कोई खास काम नहीं रह जाएगा। साथ ही राज्य सरकार के वाणिज्यिक कर विभाग के पास सेवा कर के असेसी को हैंडल करने का कोई अनुभव नहीं है।
जीएसटी लागू करने के लिए जुड़े हैं 50 हजार कर्मचारी
GST BILL
विभाग के समूह ‘ख’ और ‘ग’ के कर्मचारियों के संगठन से करीब 50,000 अधिकारी और कर्मचारी जुड़े हैं। इन्होंने सीधे-सीधे चेतावनी देते हुए पत्र में लिखा है कि यह कहने की जरूरत नहीं कि जीएसटी काउंसिल के गैरकानूनी फैसलों में न्यायिक हस्तक्षेप से जीएसटी लागू करने में अनावश्यक देरी हो सकती है।
इनका कहना है कि राज्यों को स्टेट जीएसटी, सेंट्रल जीएसटी या इंटीग्रेटेड जीएसटी लगाने का अधिकार देना संविधान का उल्लंघन है। ऑडिट और असेसमेंट के लिए 90 फीसदी असेसी को राज्यों के हवाले करने का कोई तार्किक या कानूनी आधार नहीं है। गौरतलब है कि अभी शत प्रतिशत सेवा कर असेसी केंद्र सरकार के दायरे में आते हैं।