नोट बंदी की पहली वर्षगांठ पर सरकार और विपक्ष आमने सामने है। सरकार जहां इसे भ्रष्टाचार और काला धन के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा कदम बता रही है, वहीं विपक्ष का आरोप है कि नोटबंदी ने न सिर्फ देश की अर्थव्यवस्था को रसातल में पहुंचाया है, बल्कि इसने देश में बेरोजगारी का संकट भी खड़ा किया है। विपक्ष के आरोपों और इस मुद्दे पर मचे सियासी संग्राम के बीच हिमांशु मिश्र ने वित्त मंत्री अरुण जेटली से बातचीत की। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंशः
प्रश्नः सरकार और भाजपा नोटबंदी को कालाधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ आजाद भारत का पहला और सबसे बड़ा अभियान बता रही है, जबकि पूर्व प्रधानमंत्री इसे संगठित लूट बता रहे हैं, आखिर हकीकत क्या है?
देखिये दरअसल कांग्रेस का दर्द दूसरा है। इसने सत्ता में रहते छह दशक तक भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई बड़ा निर्णय नहीं लिया। सत्ता संभालने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने शुरू से ही इसके खिलाफ संजीदगी दिखाई। इसी का परिणाम बीते साल 8 नवंबर को नोट बंदी के रूप में सामने आया। सत्ता संभालने के बाद सरकार को लगाकि गरीबों का कल्याण तभी संभव है जब जानबूझ कर कर अदा न करने वालों की सही संख्या पता लगे। आप देखिये कि इस फैसले के बाद लाखों की संख्या में करदाताओं की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। कर के रूप में सरकार की आमदनी बढ़ेगी। जाहिर तौर पर यह रकम गरीबों के हित में खर्च होगी। ऐसे में इसे संगठित लूट कैसे कह सकते हैं। संगठित लूट तो यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान हुआ टूजी, सीडब्लूजी, कोल ब्लॉक आवंटन जैसा घोटाला था।
प्रश्नः ठीक है कि यह कालाधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ा अभियान और फैसला था, मगर सवाल उठता है कि इसके आगे क्या! क्या सरकार की योजना नोट बंदी के आगे नया अभियान शुरू करने की है, क्या हम उम्मीद करें कि सरकार इस दिशा में कोई बड़ा फैसला करने जा रही है?
इस सवाल के जवाब में मेरा इतना ही कहना है कि भाजपा ने सत्ता में आने से पहले भ्रष्टाचार और कालाधन पर जीरो टॉलरेंस की बात की थी। तीन साल के अधिक के कार्यकाल में सरकार से जुड़ा एक भी भ्रष्टाचार सामने न आना यह बताता है कि हम अपने वादे की राह में सही दिशा में जा रहे हैं। जहां तक भविष्य की योजना और रणनीति की बात है तो मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि प्रधानमंत्री ने इस संदर्भ में जितनी बातें कही हैं और जितने वादे किए हैं हम उस पर रत्ती भर भी समझौता नहीं करने जा रहे। आगे क्या होगा, सरकार क्या कदम उठाएगी इसके बारे में थोड़ा इंतजार करें। जो भी होगा अच्छा होगा और एक चीज साफ है, हम भ्रष्टाचार और कालाधन के खिलाफ बिना किसी की परवाह किए हर संभव कदम उठाएंगे।
प्रश्नः मगर विपक्ष का कहना है कि नोट बंदी और इसके बाद जीएसटी ने देश की अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया है, इसके कारण बेरोजगारी बढ़ी है। कुल मिला कर आरोप यह है कि यह अपरिपक्व फैसला था, क्या कहेंगे इस बारे में।
आपको याद होगा आज से ठीक एक साल पहले जब प्रधानमंत्री ने नोट बंदी की घोषणा की थी तो उन्होंने इसके कारण कुछ समस्याओं के सामने आने की बात की थी। ये समस्याएं क्षणिक थी। सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि नकद करेंसी न केवल बैंकों के पास आई बल्कि यह भी पता चल गया कि किसके पास कितनी राशि है और इनमें से कितनी राशि ऐसी है जिस पर कर बनता है। अनुमान है कि इस फैसले के कारण देश को करीब 18 लाख नए करदाता मिलेंगे। इनसे कर के रूप मे मिली रकम का इस्तेमाल उस गरीब वर्ग के हित में होगा जो कांग्रेस के छह दशक के शासन के दौरान विकास और अवसर के मामले में हाशिये पर थे। फिर नकद करेंसी आने से विभिन्न क्षेत्रों में प्रवाह बढ़ा है। इसक असर निकट भविष्य में सामने आएगा।
प्रश्नः मगर क्या इस फैसले से बेरोजगारी नहीं बढ़ी?
शुरुआत में जरूर मुश्किलें आई, मगर अब स्थिति ऐसी नहीं है। दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि विपक्ष का कहना है कि इस फैसले के कारण विकास दर में एक फीसदी की कम की गिरावट आएगी। क्या वाकई इसकी एकमात्र वजह नोटबंदी है। अगर ऐसा है तो इससे पहले कि वित्तीय वर्ष ने नोट बंदी के फैसले से पहले अर्थव्यवस्था में 0.5 फीसदी की कमी दर्ज क्यों की गई। सवाल है कि क्या विकास दर में गिरावट के लिए सिर्फ घरेलू आर्थिक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। नहीं इसके कई बाहृय कारक भी हैं। विपक्ष सिर्फ आरोप लगाने के लिए आरोप लगाता है। अब परिस्थितियों में बदलाव आ रहा है। बैंकों में नकद करेंसी के आगमन के आगमन से तेजी से बदलाव आ रहे हैं।
प्रश्नः तब यह भी दावा किया गया था कि इस फैसले से आतंकवाद पर चोट पड़ेगी, क्या वाकई ऐसा हुआ।
आप देखिये कि इस फैसले के बाद क्या हुआ। फंडिंग के मामले में तो व्यापक असर हुआ है। कई संगठन जांच के दायरे में हैं। आतंकी संगठनों को हो रही मुश्किलें साफ नजर आ रही हैं। कई संगठन जांच के दायरे में हैं। कई संगठनों के खिलाफ जांच जारी है।