प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता तेजी से घट रही है और खेती में पानी की भारी खपत है। इससे आप कैसे निपटेंगे?
देश में 1951 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 5,177 घन मीटर थी, जो 2011 में घटकर 1,544 घन मीटर रह गई और 2014 में यह और घटकर 1,504 घन मीटर रह गई। वर्ष 2025 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1,465 और 2050 में 1,235 घन मीटर रह जाएगी। जैसे ही हम 1,000 से 1,100 घन मीटर के दायरे में आएंगे तो भारत भी पानी की कमी वाले देशों की श्रेणी में आ जाएगा। पानी के बंटवारे पर अभी तो कुछ राज्यों में ही लड़ाई हो रही है। अगर ऐसा ही रहा तो हर राज्य एक-दूसरे से लड़ना शुरू देंगे। इस स्थिति में निपटने के लिए अभी से कार्य शुरू कर दिया गया है।
किस प्रकार के कार्य शुरू किए गए हैं?
खेती के दौरान पानी की खपत कम करने के लिए तकनीक का अधिक-से-अधिक इस्तेमाल किया जा रहा है। फसलों के विविधीकरण पर जोर दिया जा रहा है। साथ ही हम एक विशेष तंत्र विकसित कर रहे हैं, जो किसानों को सुझाव देगा कि उनके खेत के लिए कौन सा फसल उचित है, जिसमें कम पानी की खपत होगी और लाभ भी पूर्ववत बना रहेगा।
देश में अभी सारी जमीनें सिंचित नहीं है, फिर भी खेती को ही पानी की खपत के लिए क्यों जिम्मेदार ठहराया जाता है?
इस समय देश में करीब 14 करोड़ हेक्टेयर जमीन में खेती होती है। इसमें से करीब 48.8 फीसदी रकबे में ही सिंचाई की सुविधा है। शेष किसान मानसून के भरोसे हैं। लेकिन जो 6.83 करोड़ हेक्टेयर सिंचित भूमि है, उसमें से करीब 60 फीसदी खेतों में जमीन से पानी निकालकर सिंचाई होती है। दिक्कत इन्हीं खेतों में है क्योंकि किसान इनके लिए जरूरत से ज्यादा पानी जमीन से निकालते हैं। इससे भूजल स्तर तेजी से घट रहा है। पंजाब में देखिए, वहां हर साल भूजल स्तर एक मीटर नीचे जा रहा है। ज्यादा सिंचाई होने से मिट्टी में नमक की मात्रा बढ़ रही है और खाद भी ज्यादा डालना पड़ रहा है।
इस दिशा में कुछ शोध हो रहा है?
बिल्कुल शोध हो रहा है। हम कुछ प्रमुख फसलों में वाटर एफिशिएंट क्रॉप पर काम कर रहे हैं। इस दिशा में काम काफी आगे बढ़ चुका है। लेकिन जब तक परिणाम नहीं आ जाएं, तब तक इस बारे में कुछ नहीं बोलेंगे। लेकिन इतना मानिए कि शीघ्र ही इस बारे में आपको अच्छी खबर मिलेगी।