आईएलएंडएफएस, 24 सहायक कंपनियां और 135 अप्रत्यक्ष सहायक कंपनियां, आधे दर्जन संबंधित कंपनियों के माध्यम से संचालित होती है जिसके कारण आईएलएंडएफएस की समस्याएं हाथ से बाहर हो गई है। ये सभी समस्याएं कंपनी के लिए आंतरिक थीं।
हालांकि बाजारों को पहला संकेत जून में मिला कि शायद आईएलएंडएफएस में कुछ गड़बड़ है जब कंपनी 400 करोड़ रुपये के कुछ इंटर-कॉरपोरेट डिपॉजिट और कमर्शियल पेपर ऋण को समय पर चुकाने में असफल रही, इसके पश्चात आईएलएंडएफएस के बकाया ऋण को प्रमुख रेटिंग एजेंसियों द्वारा डिफॉल्ट कैटेगरी में डाल दिया गया।
आईएलएंडएफएस ने सितंबर में अपने कर्ज दायित्वों में से सात बकाया ऋणों का भुगतान एक बार फिर से समय पर नहीं किया। इस समाचार से आर्थिक बाजारों में व्यापक मंदी देखने को मिली। अंत: भारत सरकार को आईएलएंडएफएस का भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्व और कुछ न करने की स्थिति में बाजारों में अप्रत्याशित नुकसान की संभावना होने के कारण हस्तक्षेप करना पड़ा।
ऐसे बना नया बोर्ड
एनसीएलटी ने सरकार के अनुरोध को मंजूरी देते हुए कंपनी के बोर्ड को निष्कासित कर दिया ता। अब अनुभवी बैंकर उदय कोटक के नेतृत्व में एक नई छह सदस्यीय बोर्ड ने कंपनी के प्रभार को संभाला है। नया बोर्ड कंपनी को फिर से स्वस्थ बनाने की दिशा में कार्य करेगा और कंपनी के लांग टर्म रोड मैप को निर्धारित करेगा। इन प्रयासों से कंपनी की समस्याओं का तुरंत निवारण तो नहीं होगा परंतु इस कदम से सरकार ने बाजारों को एक सकारात्मक संदेश दिया है।
रेटिंग डाउन ग्रेड की वजह से कंपनी डेट मार्केट से और ऋण नहीं उठा सकती अत: इसके वर्तमान निवेशकों को ही नया पूंजी निवेश करना पड़ेगा। कंपनी को अपना कॉरपोरेट स्ट्रक्चर को सरल बनाना पड़ेगा, नॉन कोर एक्टिवीटीज से बाहर आना पड़ेगा और अपने मार्किटेबल असेस्ट्स के जरिये पैसे जमा करने होंगे।
आईएलएंडएफएस की समस्याओं को प्रभावी ढंग से हल करने में काफी समय लगेगा। हालांकि इस पूरे प्रकरण में निवेशकों के आत्मविश्वास को भारी ठेस पहुंची है। आईएलएंडएफएस समूह ने कई सरकारी बैंकों, बीमा कंपनियां, भविष्य निधि; पेंशन फंड और म्यूचुअल फंडों से सीपी और एनसीडी जैसे ऋण उपकरणों के माध्यम से कर्ज उठाया था।
आईएलएंडएफएस संकट के बाद लिक्विडिटी की कमी के कारण म्यूचुअल फंड उद्योग पर भी असर पड़ा है, अनुमान बताते हैं कि कुल 70,000 करोड़ रुपये लिक्विड निधियों से रिडीम किया गया है, अल्ट्रा लिक्विड स्कीमों से भी लगभग 20,000 करोड़ रुपये का रिडम्पशन हुआ है।
आईएलएंडएफएस प्रकरण के बाद ये माना जाता है कि एनबीएफसी और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों की फंडिंग लागत पर भी असर पड़ेगा जो कि अल्पकालिक सीपी और एनसीडी के माध्यम से आर्थिक बाजारों से ऋण उठाते हैं।
इससे इन कंपनियों के मार्जिन पर खासा फर्क पड़ेगा, जिसकी वजह से इन कंपनियों का मुनाफा सीधा-सीधा कम होगा। इसके चलते शेयर मार्केट में इन कंपनियों के शेयरों में निवेशकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है।
भारतीय शेयर बाजार,जो पहले से ही रुपये और क्रूड की दोहरी मार के चलते वैसे ही निचले स्तर पर चला गया है, उसके लिए आईएलएंडएफएस प्रकरण एक नई चिंता का विषय है। इसके चलते फाइनेंशियल कंपनियों के शेयरों में खासा नुकसान हुआ है।
आईएलएंडएफएस प्रकरण में सरकार त्वरित हस्तक्षेप सराहनीय है, सरकार शायद आईएलएंडएफएस जैसी संस्थाओं के आर्थिक महत्व को भलीभांति समझती है और किन्हीं भी कारणों से ऐसी संस्थाओं को कंगाल नहीं होने दे सकती। आईएलएंडएफएस के सबसे बड़े शेयरधारक एलआईसी ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वो कंपनी को विफल नहीं होने देगा, इस प्रकरण के बाद आईएलएंडएफएस के लिए रिकवर करने की राह मुश्किल भरी व धीमी है, लेकिन शायद हम सभी इस प्रकरण से एक सबक लेंगे कि अत्यधिक ऋण और कॉम्पलेक्स कॉर्पोरेट स्ट्ररचर किसी भी संस्था के लिए लाभकारी नहीं हो सकता। हमें आशा है कि उद्योग जगत इस प्रकरण से सीख लेगा व ऐसी गलतियां दुबारा से नहीं दोहराई जाएगी।