पैट्रीशिया स्मिथ अमरीका की मिशिगन यूनिवर्सिटी की फास्ट फूड के अर्थशास्त्र की प्रोफेसर हैं। स्मिथ कहती हैं कि आखिर में मुकाबला कम से कम दाम पर अपने उत्पाद बेचने का होता है। एक डॉलर या इससे भी कम कीमत की चीजें बाजार में उतारी जाती हैं।
स्मिथ का कहना है कि ऐसा कर के कंपनियां ये उम्मीद करती हैं कि वो ज्यादा से ज्यादा सामान बेच पाएंगी। ज्यादा सामान बिकेगा, तो उनका मुनाफा बढ़ेगा। जैसे कि अगर मैक्डोनॉल्ड्स 1 डॉलर वाले ढेर सारे बर्गर बेचेगा, तो उसका मुनाफा बढ़ेगा और फिर लोग सिर्फ बर्गर तो लेंगे नहीं। वो इनके साथ फ्रेंच फ्राइज, ड्रिंक और डेजर्ट भी लेंगे।
लेकिन, सस्ते दाम पर सामान बेचने का नुस्खा कभी-कभी भारी भी पड़ सकता है। खास तौर से तब, जब सामान की कीमत उसकी लागत से भी कम हो जाए। 2009 में बर्गर किंग की फ्रैंचाइजी चलाने वालों ने कंपनी पर मुकदमा ठोक दिया था। इसकी वजह ये थी कि कंपनी की मार्केटिंग की रणनीति के तहत उन्हें एक डॉलर के डबल चीज बर्गर बेचने पड़े। जबकि उसकी लागत एक डॉलर से ज्यादा बैठती थी। हालांकि अदालत ने बर्गर किंग के हक में ही फैसला दिया।
वैसे कम से कम दाम पर फास्ट फूड बेचने की रणनीति कारगर रहेगी या नहीं, इस बात का फैसला होना अभी बाकी है। इसकी वजह है हमारे खान-पान में आया बदलाव। अब हम सेहत को लेकर ज्यादा जागरूक हो गए हैं। फास्ट फूड खाने से लोग परहेज करते हैं। आज की तारीख में लोग सस्ते खाने से ज्यादा सेहतमंद खाने की तलाश करते हैं। किसी को ऑर्गेनिक फूड चाहिए। तो, किसी को बिना तेल वाला खाना।
खान-पान को लेकर नई पीढ़ी की सोच में आए बदलाव का सबसे बुरा असर फास्ट फूड कंपनियों पर ही पड़ा है। लोग बर्गर से ज्यादा खुद से चुन सकने वाले सलाद को तरजीह देते हैं। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में न्यूट्रिशन की प्रोफेसर मैरियॉन नेस्ले कहती हैं कि आज फास्ट फूड कंपनियां लोगों को अपने स्टोर्स में लाने को बेताब हैं। इसीलिए मैक्डोनॉल्ड्स ने यूबर के साथ करार किया है, ताकि लोग उसके स्टोर तक आएं।
लंदन की सिटी यूनिवर्सिटी के मार्टिन काराहर कहते हैं कि पांच बरस पहले फास्टफूड कंपनियां चाहती थीं कि लोग आएं, खाएं और चलते बनें। आज वो चाहती हैं कि ग्राहक आएं और तसल्ली से उनके यहां वक्त गुजारें। देर तक ठहरेंगे, तो लोग कुछ न कुछ खरीदेंगे ही। इसीलिए फास्ट फूड स्टोर्स में कभी लाउंज सिटिंग की व्यवस्था होती है, तो कहीं पर मुफ्त वाई-फाई का इंतजाम होता है।
अब सवाल ये है कि जब फास्ट फूड के दाम उसकी लागत से भी कम हो गए, तो फिर उससे नीचे भी जाएंगे क्या? न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की मैरियॉन नेस्ले कहती हैं कि फास्ट फूड इंडस्ट्री ज्यादा से ज्यादा सामान बेचने की रणनीति पर काम करती है। ताकि कम कीमत पर सामान बेचकर भी मुनाफा कमाया जा सके।
असल मकसद होता है ग्राहकों को अपने स्टोर तक ले आना। फिर दाम कम होने पर किसी खास ब्रैंड के शौकीन लोग भी दूसरी कंपनियों के मेनू को ट्राई करते हैं। पैट्रीशिया स्मिथ कहती हैं कि हर धंधे में कंपनियां इस दुविधा में रहती हैं कि वो दाम घटाएं या बढ़ाएं। कहीं दाम बढ़ाने से उसके ग्राहक छिटक न जाएं या दाम घटाने से उसके पास और ग्राहक आएंगे क्या?
कोई कंपनी अगर 5 फीसद दाम घटाकर 10 फीसद ज्यादा सामान बेच लेती है, तो उसका मुनाफा बढेगा ही, घटेगा नहीं। पैट्रीशिया कहती हैं कि कम कीमत या ये युद्ध उन कंपनियों के बीच छिड़ता है, जो ऊपरी पायदान पर होती हैं और बड़े बाजार पर उनका कब्जा होता है। जैसे अमरीका में 40 फीसद बाजार पर 4 या 5 कंपनियों का कब्जा है। इस 40 प्रतिशत बाजार का मतलब 80 अरब डॉलर का कारोबार है।
अमरीका ही नहीं ब्रिटेन में भी कंपनियां कम कीमत वाले उत्पाद बाजार में ला रही हैं। जैसे कि मार्क्स ऐंड स्पेंसर 10 पाउंड में दो लोगों को खाना खिलाने का ऑफर दे रही है। वहीं सुपरमार्केट चेन टेस्को 4 पाउंड में लंच स्पेशल ऑफर लेकर आई।
हालांकि अमरीका के मुकाबले यूरोपीय देशों में कंपनियों का जोर ग्रीन प्रोडक्ट यानी कुदरत के लिए कम नुकसानदेह उत्पाद बेचने पर है। इसलिए यूरोपीय देशों में कम कीमत पर फास्ट फूड बेचने का ये युद्ध शायद न देखने को मिले।
तमाम कंपनियों ने इस बारे में खामोशी अख्तियार कर रखी है कि वो कीमतों में और कितनी कटौती करेंगे। बस वो ग्राहकों को कम कीमत पर सामान देने की बात करती हैं। मिशिगन यूनिवर्सिटी की पैट्रीशिया स्मिथ कहती हैं कि कंपनियां अपने मौजूदा ग्राहकों को अपने साथ जोड़े रखने की कोशिश कर रही हैं, क्योंकि नई पीढ़ी तो पहले ही सेहतमंद खाने पर जोर दे रही है।
अभी ये साफ नहीं है कि आखिर गिरती कीमतों से फास्ट फूड के कारोबार का क्या होगा?
मगर सेहत से जुड़े लोग इस बात से फिक्रमंद हैं। उन्हें चिंता है कि सस्ता होने पर लोग ज्यादा फास्ट फूड खाएंगे। ऐसे में मोटापे की समस्या और दूसरी बीमारियां बढेंगी। अमरीका तो पहले से ही दुनिया का सबसे ज्यादा मोटापे का शिकार देश है।
लेकिन, दाम कम होने का ये असर भी हो सकता है कि तमाम कंपनियां सेहत को कम नुकसान पहुंचाने वाले उत्पाद बनाएं। अमरीका में कई ऐसी कंपनियां हैं जो ताजा और सेहतमंद खाने का सामान बेच रही हैं। जैसे कि स्वीटग्रीन्स और फ्रेश जो हरे, पत्तेदार सामान बेचते हैं। इसी तरह व्होल फूड्स नाम की कंपनी भी तेजी से विस्तार कर रही है। ये कंपनी सेहतमंद खाना बेचती है।
साफ है कि फास्ट फूड की दुनिया बदल रही है।