प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नोटबंदी द्वारा कालेधन के खिलाफ मुहिम, 50 दिनों तक आम जनता का खामोशी से घंटों लाइनों में खड़े रहकर 1,000 और 500 रुपये के पुराने नोटों को बदलवाना भाजपा की राजनीतिक साख को बढ़ाएगा या नहीं, इसका फैसला 11 मार्च को पांच प्रदेशों की जनता करेगी। लेकिन, नोटबंदी की अभूतपूर्व घटना से दो बातें बिल्कुल साफ हैं।
पहली बात यह कि जनता कालेधन पर मोदी के साथ है और दूसरी, नोटबंदी कालेधन पर प्रधानमंत्री की आखिरी कार्रवाई नहीं थी। पिछले शुक्रवार को प्रधानमंत्री कार्यालय ने राजस्व और कारपोरेट अफेयर्स मंत्रालय के सचिवों की अध्यक्षता में एक टास्क फोर्स बनाई है। यह टास्क फोर्स नोटबंदी के दौरान शरारती तत्वों द्वारा शेल कंपनियों के जरिए बड़े पैमाने पर कालेधन को सफेद करने के खेल की छानबीन करेगी।
शेल कंपनियां वैसी कागजी कंपनियां होती हैं, जिनके अधिकतर निदेशक बेनामी होते हैं और कई बार एक ही पते पर सैकड़ों शेल कंपनियां पंजीकृत होती हैं। ये कंपनियां टैक्स बचाने और कालेधन को सफेद करने के लिए खोली जाती हैं। टैक्सनेट से बचने के लिए ऐसी कंपनियां रिटर्न भी फाइल नहीं करती हैं। देश की डेढ़ करोड़ कंपनियों में से सिर्फ 4 फीसदी यानी लगभग 6 लाख कंपनियां ही रिटर्न भरती हैं।
जाहिर है कि बाकी की 96 फीसदी में से अधिकतर कंपनियां शेल अथवा छद्म कंपनियां होंगी। कथित तौर पर ये कंपनियां राजनीतिक संरक्षण और सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से फलती फूलती हैं। अगर सरकार चाहे तो सभी कंपनियों के प्रवर्तकों और निदेशकों के नामों को आधार से जोड़कर शेल कंपनियों पर बहुत हद तक लगाम लगा सकती है। आधार का प्रयोग बेनामी संपत्तियों को भी खंगालने में किया जा सकता है। जाहिर है अब मोदी की कालेधन के खिलाफ मुहिम का अगला लक्ष्य बेनामी संपत्ति हो सकता है।