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दोहरे नियंत्रण की समस्या से मुक्त होंगे सहकारी बैंक, आरबीआई के अधीन आने से बेहतर होगा प्रबंधन

Thu, 25 Jun 2020 05:42 AM IST
योगेश साहू अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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सहकारी बैंकों के आरबीआई के नियंत्रण में आने से दोहरे नियमन की समस्या से छुटकारा मिल जाएगा। अभी तक इनका नियमन और नियंत्रण तो रिजर्व बैंक के अधीन होता है लेकिन इसका प्रशासन राज्य सरकार के अधीन आने वाली सहकारी कंपनियों के निबंधक (आरसीएस) के हाथ में होता है।

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केंद्रीय कैबिनेट ने सहकारी बैंकों को पूरी तरह आरबीआई के अधीन लाने के फैसले पर मुहर लगाकर इस समस्या को खत्म कर दिया है। अभी छोटे सहकारी बैंक का प्रबंधन नाबार्ड और आरसीएस को रिपोर्ट करता है। इस दोहरे नियमन की वजह से इनके प्रबंधन में कई समस्याएं आती हैं, जिन पर अब विराम लग जाएगा।

सहकारी बैंकिंग प्रणाली में कॉर्पोरेट प्रशासन की कमी गंभीर विषय है, जिससे जल्द निपटना आवश्यक है। साथ ही इनके ऑडिटर को ज्यादा जवाबदेह बनाने की जरूरत है, क्योंकि कई मामलों में ऑडिटर की मौजूदगी के बावजूद घोटाए हुए हैं।
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44 सहकारी बैंक निगरानी में
सरकार ने 44 सरकारी बैंकों को उनकी बिगड़ती माली हालत की वजह से निगरानी सूची में रखा है। महाराष्ट्र के सीकेपी सहकारी बैंक और गोवा के मापुसा शहरी सहकारी बैंक को काम बंद करने के आदेश दिए गए हैं। यह भी तय नहीं हुआ है कि शहरी सहकारी बैंकों के मानदंड ही ग्रामीण सहकारी बैंकों पर भी लागू होंगे, जहां तीन तरह के सहकारी बैंक हैं।

इन बदलावों की सिफारिश
आरबीआई के पूर्व गवर्नर आर. गांधी की अगुवाई वाली समिति ने सिफारिश की थी कि सहकारी बैंकों को बंद करने और उन्हें पूंजी देने के नियम बनाए जाएं। यदि शहरी सहकारी बैंक स्वेच्छा से छोटे वित्त बैंकों में बदलना चाहते हैं और केंद्रीय बैंक के मानदंडों पूरा करते हैं तो इसकी अनुमति दी जानी चाहिए।

वाणिज्यिक बैंक और सहकारी बैंक में फर्क
वाणिज्यिक बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक के नियंत्रण के अधीन हैं। सहकारी बैंक अभी तक सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार द्वारा निर्धारित नियमों के अधीन हैं। सहकारी बैंकों में वाणिज्यिक बैंकों की तुलना में कई तरह की बैंकिंग सेवाएं देने की कम क्षमता होती है।सहकारी बैंकों की ब्याज दर वाणिज्यिक बैंकों की तुलना में अधिक रहती है।

सहकारी बैंक का इतिहास
1904 में सहकारी समिति अधिनियम के पारित होने के साथ शुरू हुआ। इस अधिनियम का उद्देश्य सहकारी ऋण समितियों की स्थापना करना था। ग्रामीण क्षेत्र में सहकारिता की सदस्यता मात्र 45 प्रतिशत ही है। यानी ग्रामीण क्षेत्र के 55 प्रतिशत लोग अब तक सहकारिता से जुड़ ही नहीं पाए हैं। 1972 में गठित बैंकिंग आयोग ने इसके लिए निम्नलिखित कारणों को जिम्मेदार बताया था।

  • ऋण हेतु निश्चित सुरक्षा प्रदान करने में लोगों की अक्षमता।
  • भूमि रिकॉर्ड का कुप्रबंधन।
  • निर्धारित क्रेडिट सीमा की अपर्याप्तता।
  • ऋण चुकाने में सदस्य की अयोग्यता। 
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