अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
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क्या फार्मा और रिसर्च सेक्टर पर पड़ेगा सीधा असर?
इस फैसले का सबसे गहरा असर अमेरिका के विशाल फार्मास्युटिकल उद्योग और आरएंडडी (अनुसंधान और विकास) क्षमता पर पड़ने की आशंका है। जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के पब्लिक हेल्थ लॉ एक्सपर्ट लॉरेंस गोस्टिन के मुताबिक, अमेरिका की ओर से कदम पीछे खींचने का फैसला अमेरिकी वैज्ञानिकों और दवा कंपनियों की नई बीमारियों के खिलाफ टीके और दवाएं विकसित करने की क्षमता को बाधित करेगी।
अमेरिका ने फ्लू के स्ट्रेन का आकलन करने वाली और फ्लू शॉट्स को अपडेट करने के निर्णय लेने वाली WHO की समितियों और तकनीकी समूहों में भाग लेना बंद कर दिया है। गोस्टिन का मानना है कि इस 'डिजीज इंटेलिजेंस' (रोग की खुफिया जानकारी) के अभाव में, जब नई महामारियां फैलेंगी, तो अमेरिकी दवा कंपनियां और नागरिक टीके और दवाओं के लिए लाइन में सबसे आगे रहने का अपना रणनीतिक लाभ खो सकते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
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ट्रंप प्रशासन का पूरे मामले पर क्या तर्क है?
ट्रम्प प्रशासन का तर्क है कि वह WHO को बिचौलिया बनाने के बजाय देशों के साथ सीधे डेटा साझा करने की व्यवस्था करेगा। हालांकि, विशेषज्ञों ने इस योजना की व्यावहारिकता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। गोस्टिन ने रणनीतिक जोखिमों की ओर इशारा करते हुए कहा कि क्या चीन, जहां कई वायरस पहली बार देखे जाते हैं, या वे देश जिन पर अमेरिका ने भारी टैरिफ लगाए हैं, अमेरिका के साथ सीधे अनुबंध करेंगे? उन्होंने कहा कि यह दावा लगभग हास्यास्पद है। प्रशासन के अधिकारियों ने भी स्वीकार किया है कि अन्य देशों से डेटा तक पहुंच खोना एक समस्या है, जो अमेरिका को नई महामारी की प्रारंभिक चेतावनी दे सकता था।
दावोस में डोनाल्ड ट्रंप
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अमेरिका ने क्यों लिया यह फैसला?
राष्ट्रपति ट्रंप ने पदभार संभालने के बाद एक कार्यकारी आदेश में कोरोना महामारी के कुप्रबंधन और आवश्यक सुधारों में विफलता का हवाला देते हुए WHO से हटने का एलान किया था। प्रशासन की शिकायतों में यह भी कहा गया 1948 में संगठन के निर्माण के बाद से इसके नौ मुख्य अधिकारियों में से कोई भी अमेरिकी नहीं रहा है, जबकि अमेरिका इसका सबसे बड़ा फाइनेंसर रहा। साथ ही, महामारी के दौरान WHO की गलतियों, जैसे मास्क न पहनने की सलाह और COVID-19 के एयरबोर्न (हवा से फैलने वाले) होने से इनकार करना (जिसे 2024 तक आधिकारिक रूप से नहीं बदला गया), को भी कारण बताया गया है।
इन्फेक्शियस डिजीज सोसाइटी ऑफ अमेरिका के अध्यक्ष डॉ. रोनाल्ड नहास ने अमेरका के WHO से बाहर होने के फैसले को अदूरदर्शी और वैज्ञानिक रूप से लापरवाह करार दिया है। वहीं, लॉरेंस गोस्टिन ने इसे किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से लिया गया सबसे खराब फैसला बताया है।
अमेरिका का यह कदम केवल एक कूटनीतिक बदलाव नहीं है, बल्कि उसे इसके दूरगामी आर्थिक परिणाम भी झेलने पड़ सकते हैं। इस इससे WHO की वित्तीय हालत खस्ता हागी वहीं अमेरिकी फार्मा सेक्टर वैश्विक डेटा नेटवर्क से अलग-थलग पड़ जाएगा। अब देखना यह होगा कि क्या अमेरिका द्विपक्षीय समझौतों के जरिए इस खाई को पाट पाता है या यह फैसला स्वास्थ्य सुरक्षा के लिहाज से महंगा साबित होगा।