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अमेरिका का WHO से 'ब्रेकअप': एजेंसी बोली- 10800000000 करोड़ रुपये बकाया, जानिए अब ट्रंप के देश पर क्या खतरा?

Fri, 23 Jan 2026 05:35 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

WHO: अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन से खुद के किनारा करने पर मुहर लगा दी है। जानिए कैसे 133 मिलियन डॉलर के बकाया विवाद और डेटा शेयरिंग की सुविधा खत्म होने से यह फैसला अमेरिकी फार्मा सेक्टर और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा पर विनाशकारी असर डाल सकता है? पूरी रिपोर्ट पढ़ें।
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अमेरिका और विश्व स्वास्थ्य संगठन का टूटा रिश्ता। - फोटो : amarujala.com
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विस्तार
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वैश्विक स्वास्थ्य कूटनीति और अर्थव्यवस्था के लिए एक निर्णायक मोड़ पर, अमेरिका ने गुरुवार को विश्व स्वास्थ्य संगठन  से मुंह मोड़ लिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से 78 साल पुरानी इस साझेदारी को समाप्त करने की घोषणा के ठीक एक साल बाद अब इसे अंतिम रूप दे दिया गया है। यह कदम अमेरिकी फार्मास्युटिकल उद्योग और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए गंभीर आर्थिक और रणनीतिक सवाल खड़े करता है। 

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अमेरिका और विश्व स्वास्थ्य संगठन के बीच हुए अलगाव के केंद्र में एक बड़ा वित्तीय विवाद है। जिनेवा स्थित एजेंसी के अनुसार, अमेरिका को संगठन का 130 मिलियन डॉलर (लगभग 1,080 करोड़ रुपये) से अधिक चुकाना है। दस्तावेजों से पता चलता है कि अमेरिका ने 2024 और 2025 के लिए अपने सदस्यता शुल्क का भुगतान नहीं किया है, इससे कुल कुल बकाया राशि 133 मिलियन डॉलर से अधिक हो गई है।

अमेरिका ऐतिहासिक रूप से WHO का सबसे बड़ा दानदाता रहा है। यूएस डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ एंड ह्यूमन सर्विसेज के अनुसार, अमेरिका औसतन 11.1 करोड़ डॉलर प्रति वर्ष सदस्यता शुल्क और लगभग 57 करोड़ डॉलर सालाना स्वेच्छा से योगदान देता रहा है। 
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नियमों के मुताबिक, निकासी से पहले एक साल का नोटिस देने और वित्तीय दायित्वों को पूरा करने की जरूरत होती है, लेकिन ट्रंप प्रशासन के एक अधिकारी ने गुरुवार को साफ कर दिया कि अमेरिका पर सदस्य के रूप में पीछे हटने से पहले उस पर भुगतान करने का कोई दायित्व नहीं था।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
क्या फार्मा और रिसर्च सेक्टर पर पड़ेगा सीधा असर?
इस फैसले का सबसे गहरा असर अमेरिका के विशाल फार्मास्युटिकल उद्योग और आरएंडडी (अनुसंधान और विकास) क्षमता पर पड़ने की आशंका है। जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के पब्लिक हेल्थ लॉ एक्सपर्ट लॉरेंस गोस्टिन के मुताबिक, अमेरिका की ओर से कदम पीछे खींचने का फैसला अमेरिकी वैज्ञानिकों और दवा कंपनियों की नई बीमारियों के खिलाफ टीके और दवाएं विकसित करने की क्षमता को बाधित करेगी।

अमेरिका ने फ्लू के स्ट्रेन का आकलन करने वाली और फ्लू शॉट्स को अपडेट करने के निर्णय लेने वाली WHO की समितियों और तकनीकी समूहों में भाग लेना बंद कर दिया है। गोस्टिन का मानना है कि इस 'डिजीज इंटेलिजेंस' (रोग की खुफिया जानकारी) के अभाव में, जब नई महामारियां फैलेंगी, तो अमेरिकी दवा कंपनियां और नागरिक टीके और दवाओं के लिए लाइन में सबसे आगे रहने का अपना रणनीतिक लाभ खो सकते हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : ANI
ट्रंप प्रशासन का पूरे मामले पर क्या तर्क है?
ट्रम्प प्रशासन का तर्क है कि वह WHO को बिचौलिया बनाने के बजाय देशों के साथ सीधे डेटा साझा करने की व्यवस्था करेगा। हालांकि, विशेषज्ञों ने इस योजना की व्यावहारिकता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। गोस्टिन ने रणनीतिक जोखिमों की ओर इशारा करते हुए कहा कि क्या चीन, जहां कई वायरस पहली बार देखे जाते हैं, या वे देश जिन पर अमेरिका ने भारी टैरिफ लगाए हैं, अमेरिका के साथ सीधे अनुबंध करेंगे? उन्होंने कहा कि यह दावा लगभग हास्यास्पद है। प्रशासन के अधिकारियों ने भी स्वीकार किया है कि अन्य देशों से डेटा तक पहुंच खोना एक समस्या है, जो अमेरिका को नई महामारी की प्रारंभिक चेतावनी दे सकता था।
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दावोस में डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : PTI
अमेरिका ने क्यों लिया यह फैसला?
राष्ट्रपति ट्रंप ने पदभार संभालने के बाद एक कार्यकारी आदेश में कोरोना महामारी के कुप्रबंधन और आवश्यक सुधारों में विफलता का हवाला देते हुए WHO से हटने का एलान किया था। प्रशासन की शिकायतों में यह भी कहा गया 1948 में संगठन के निर्माण के बाद से इसके नौ मुख्य अधिकारियों में से कोई भी अमेरिकी नहीं रहा है, जबकि अमेरिका इसका सबसे बड़ा फाइनेंसर रहा। साथ ही, महामारी के दौरान WHO की गलतियों, जैसे मास्क न पहनने की सलाह और COVID-19 के एयरबोर्न (हवा से फैलने वाले) होने से इनकार करना (जिसे 2024 तक आधिकारिक रूप से नहीं बदला गया), को भी कारण बताया गया है।

इन्फेक्शियस डिजीज सोसाइटी ऑफ अमेरिका के अध्यक्ष डॉ. रोनाल्ड नहास ने अमेरका के WHO से बाहर होने के फैसले को अदूरदर्शी और वैज्ञानिक रूप से लापरवाह करार दिया है। वहीं, लॉरेंस गोस्टिन ने इसे किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से लिया गया सबसे खराब फैसला बताया है।

अमेरिका का यह कदम केवल एक कूटनीतिक बदलाव नहीं है, बल्कि उसे इसके दूरगामी आर्थिक परिणाम भी झेलने पड़ सकते हैं। इस इससे WHO की वित्तीय हालत खस्ता हागी वहीं अमेरिकी फार्मा सेक्टर वैश्विक डेटा नेटवर्क से अलग-थलग पड़ जाएगा। अब देखना यह होगा कि क्या अमेरिका द्विपक्षीय समझौतों के जरिए इस खाई को पाट पाता है या यह फैसला स्वास्थ्य सुरक्षा के लिहाज से महंगा साबित होगा।

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