रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर अमेरिका के दबाव के बीच भारत एक अहम नीतिगत मोड़ पर खड़ा है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, अगर भारत ने अपने रुख में स्पष्टता नहीं लाई तो उसे अधिक व्यापारिक लागत और कड़े टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है।
अमेरिकी कांग्रेस में भी दबाव तेज हो रहा है। सीनेटर लिंडसे ग्राहम ऐसे कानून को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसके तहत यूक्रेन में 50 दिनों के भीतर युद्धविराम न होने पर रूस से तेल-गैस खरीदने वाले देशों पर सेकेंडरी टैरिफ लगाए जा सकते हैं।
GTRI का कहना है कि यह अस्पष्टता भारत की स्थिति को कमजोर कर रही है। रिपोर्ट में कहा गया कि अगर भारत रूसी तेल आयात बंद करना चाहता है तो उसे साफ और निर्णायक ढंग से करना चाहिए। और अगर गैर-प्रतिबंधित स्रोतों से खरीद जारी रखनी है, तो इसे खुले तौर पर कहकर आंकड़ों के साथ समर्थन देना होगा। मौजूदा अनिर्णय अब टिकाऊ नहीं है।
रिपोर्ट ने यह भी आगाह किया कि रूसी तेल आयात खत्म करने से अमेरिकी दबाव अपने आप खत्म नहीं होगा। इसके बजाय व्यापारिक मांगें कृषि, डेयरी, डिजिटल व्यापार और डेटा गवर्नेंस जैसे क्षेत्रों में शिफ्ट हो सकती हैं। साथ ही, मौजूदा टैरिफ दबाव वॉशिंगटन के एक खास राजनीतिक दौर से जुड़ा है, जो स्थायी नहीं भी रह सकता।
जीटीआरआई के मुताबिक, यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया ने अमेरिका के साथ तनाव कम करने के लिए रूसी तेल आयात घटाया, जबकि रूस का सबसे बड़ा खरीदार चीन अपने रणनीतिक वजन के कारण अपेक्षाकृत कम दबाव में रहा। इस बीच, मई से नवंबर 2025 के बीच अमेरिका को भारत का निर्यात 20.7% घट चुका है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगर टैरिफ और बढ़े तो यह गिरावट और गहरी हो सकती है।
जीटीआरआई ने कहा कि जैसे-जैसे टैरिफ का खतरा सख्त होता जा रहा है, भारत को रूसी तेल पर साफ फैसला लेना होगा, उस फैसले की जिम्मेदारी लेनी होगी और उसे वॉशिंगटन तक बिना किसी अस्पष्टता के पहुंचाना होगा।