अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर ग्रीनलैंड को लेकर वैश्विक बहस के केंद्र में हैं। ट्रंप का कहना है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की सुरक्षा और भविष्य की रणनीति के लिए बेहद अहम है और वॉशिंगटन को इसकी 'हर हाल में जरूरत' है। इसी सोच के तहत अमेरिका ने ग्रीनलैंड की करीब 57 हजार आबादी को आर्थिक प्रस्ताव देकर डेनमार्क से अलग होने और अमेरिका में शामिल होने के लिए मनाने की संभावनाओं पर विचार शुरू किया है।
ट्रंप के इन बयानों के बाद यूरोप में चिंता तेज हो गई है। फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन, ब्रिटेन और डेनमार्क समेत कई देशों ने संयुक्त बयान जारी कर अमेरिका को चेताया है। बयान में साफ कहा गया कि ग्रीनलैंड वहां के लोगों का है और उसके भविष्य का फैसला वही करेंगे। डेनमार्क ने यहां तक चेतावनी दी कि अगर ग्रीनलैंड की संप्रभुता पर हमला हुआ, तो इसका असर सीधे नाटो जैसे गठबंधन पर पड़ सकता है।
अमेरिका की दिलचस्पी के पीछे सबसे बड़ी वजह ग्रीनलैंड की खनिज संपदा है। यह इलाका रेयर अर्थ मिनरल्स से भरपूर माना जाता है, जो मोबाइल फोन, कंप्यूटर, इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी और अन्य हाईटेक उपकरणों के लिए बेहद जरूरी हैं। फिलहाल इन अहम खनिजों की वैश्विक सप्लाई पर चीन का लगभग एकाधिकार है। ऐसे में अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहते हैं। इसी रणनीति के तहत ग्रीनलैंड के खनिज अमेरिका के लिए बड़ा आकर्षण बन गए हैं।
खनिजों के अलावा ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति भी अमेरिका के लिए बेहद अहम है। इसका करीब 80 फीसदी हिस्सा आर्कटिक सर्कल के भीतर आता है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने यहां सैन्य मौजूदगी इसलिए बढ़ाई थी, ताकि यह क्षेत्र नाजी जर्मनी के हाथ न लगे और उत्तरी अटलांटिक के समुद्री रास्ते सुरक्षित रहें। अब जलवायु परिवर्तन के चलते आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे नए समुद्री मार्ग खुलने की संभावना बढ़ गई है। इससे रूस, चीन और पश्चिमी देशों के बीच इस क्षेत्र को लेकर प्रतिस्पर्धा और तेज हो गई है।