राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के सदस्य, पीपीपी, नीरज वर्मा का कहना है कि जीएसटी की वजह से उनकी परियोजनाओं की लागत पर चार से पांच फीसदी का असर पड़ा है। उनका कहना है कि अब एनएचएआई की परियोजनाओं में स्टील, सीमेंट आदि का उपयोग काफी बढ़ रहा है।
जीएसटी से पहले सीमेंट या स्टील पर 12-14 फीसदी का केन्द्रीय उत्पाद शुल्क लगता था जबकि विभिन्न राज्यों में 10 से 15 फीसदी का वैल्यू एडेड टैक्स (वैट) लगता था। मतलब इस पर कुल मिला कर 22 से 29 फीसदी का कर चुकाना पड़ता था।
इसके अलावा कई कमोडिटी पर कैसकेडिंग इफेक्ट पड़ता था मतलब टैक्स पर टैक्स। जीएसटी लगने से यह सब खत्म हो गया। इसलिए अभी चार से पांच फीसदी का इंपेक्ट पड़ा है। हालांकि वह कहते हैं कि उन्हें सड़क बनाने के लिए पैसा सरकार से ही मिलता है और टैक्स का पैसा सरकार के खजाने में ही जाता है, इसलिए कोई दिक्कत की बात नहीं है।
रेल परियोजनाओं पर बढ़ गया 10 फीसदी का बोझ
भारतीय रेल की लेखा सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि जीएसटी लागू होने के बाद उनकी परियोजनाओं की लागत करीब 10 फीसदी बढ़ गई है। उनके मुताबिक पहले उनकी परियोजनाओं पर सर्विस टैक्स नहीं लगता था क्योंकि वित्त विधेयक 1994 में ही ऐसी व्यवस्था कर दी गई थी कि रेल, सड़क और हवाई अड्डे की परियेेजनाओं पर सर्विस टैक्स नहीं लगे। लेकिन जीएसटी में ऐसी व्यवस्था नहीं है। इसलिए अब जीएसटी चुकाना पड़ता है। इसके साथ ही रेलवे को इनपुट टैक्स क्रेडिट का भी लाभ नहीं मिल पाता है, इसलिए परियोजना लागत बढ़ गई है।
छोटे काम पर तो 20 फीसदी का असर
एनएचएआई के एक इंजीनियर का कहना है कि मरम्मत या छोटे-मोटे काम पर तो जीएसटी की वजह से करीब 20 फीसदी लागत बढ़ गई है। ऐसा इसलिए कि इसके लिए छोटे-छोटे ठेकेदारों को काम देते हैं और अक्सर वे इनपुट टैक्स का लाभ नहीं लेते। इसलिए सारी बिलिंग उन्हीं के नाम होती है और कर चुकाना पड़ता है।