रिजर्व बैंक ने अपनी आधार दरों में होने वाली कटौती का पूरा लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिए ही बैंकों से 1अक्तूबर, 2019 से सभी खुदरा कर्ज की ब्याज दरें बाहरी बेंचमार्क पर तय करने को कहा था। अभी तक एसबीआई सहित तमाम सरकारी बैंक अपनी दरों को रेपो रेट से जोड़ चुके हैं।
हालांकि, अक्तूबर के बाद से रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में कोई कटौती नहीं की। ऐसे में जिन उपभोक्ताओं ने रेपो से जुड़े कर्ज को अपनाना चाहा, उन्हें फिलहाल और कटौती का लाभ नहीं मिला है।
आरबीआई की मौजूदा रेपो दर 5.15 फीसदी है और नए कर्ज की दरें इसी को आधार मानकर तय की जा रही हैं। ऐसे में अगर अप्रैल की एमपीसी बैठक में आरबीआई रेपो रेट घटाता है, तो जितनी कटौती केंद्रीय बैंक करेगा, उतना ही आपका लोन भी सस्ता हो जाएगा।
ऐसे करें नफा-नुकसान की गणना
एक आंकड़े के मुताबिक, मार्च 2019 तक लगभग सभी सरकारी बैंक 8.95 फीसदी ब्याज (एमसीएलआर) पर 30 से 70 लाख रुपये तक के लोन की पेशकश करते थे। अगर किसी व्यक्ति ने मार्च 2019 में कर्ज लिया था, तो एक साल बाद मार्च 2020 में जब इसकी दरों का पुनर्निधारण होगा तो यह 8.30 फीसदी के आसपास हो सकती हैं।
इसी तरह, अगर कोई उपभोक्ता अपने कर्ज को एमसीएलआर से शिफ्ट कर रेपो लिंक ब्याज दर में ले जाता है, तो मार्च 2020 में उसकी ब्याज दर 8.20 फीसदी के आसपास हो सकती है। ऐसे में दोनों ही आधार पर कर्ज की ब्याज दरों में सिर्फ 10 आधार अंक का अंतर दिख रहा है।
कमोबेश यही हालात निजी क्षेत्र के बैंकों के भी होेंगे, जो अभी 35-70 लाख रुपये तक कर्ज पर 8.40-9.05 फीसदी ब्याज की पेशकश करते हैं। यहां भी अगर किसी ग्राहक ने मार्च 2019 में 9.20 फीसदी ब्याज पर कर्ज लिया था, तो उसे मार्च 2020 में 8.60 फीसदी की पेशकश हो सकती है।