भारतीय कॉरपोरेट जगत के सबसे बड़े समूह टाटा संस के शीर्ष प्रबंधन में एक अभूतपूर्व कानूनी और कॉरपोरेट लड़ाई छिड़ गई है। टाटा ट्रस्ट्स ने बोर्ड के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को पांच साल का नया कार्यकाल देने के प्रस्ताव को पूरी तरह से गैर-कानूनी और कानूनी रूप से गलत करार दिया है। ट्रस्ट्स ने कहा है कि उनके चेयरमैन व नामांकित निदेशक नोएल टाटा द्वारा प्रस्ताव के खिलाफ मतदान करने के बाद यह फैसला नियमों के तहत पूरी तरह से अवैध और आधारहीन हो चुका है।
टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के नियमों के अनुसार, चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव वैध होने के लिए टाटा ट्रस्ट्स द्वारा नामांकित दोनों निदेशकों की मौजूदगी और दोनों की सहमति अनिवार्य है। बृहस्पतिवार को हुई बोर्ड बैठक में यह प्रस्ताव चार निदेशकों के पक्ष में मतदान और नोएल टाटा के विरोध के बाद पास किया गया था।
यह पूरा विवाद भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा 11 सितंबर को टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी पंजीकरण सरेंडर करने की अर्जी खारिज किए जाने के बाद उपजा है। आरबीआई ने 2022 में टाटा संस को 'अपर लेयर' एनबीएफसी के रूप में वर्गीकृत किया था, जिसके तहत तीन साल के भीतर यानी सितंबर 2025 तक शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य था।
टाटा संस के शेयर बाजार में लिस्ट होने को लेकर प्रमुख शेयरधारकों के बीच भारी खींचतान चल रही है:
चंद्रशेखरन द्वारा पहले पद छोड़ने की घोषणा के बाद सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने नए चेयरमैन की खोज के लिए एक प्रक्रिया शुरू की थी। इसमें टाटा स्टील के सीईओ टीवी नरेंद्रन, और टाटा संस के सीएफओ सौरभ अग्रवाल के नामों पर चर्चा चल रही थी। हालांकि बोर्ड के वोट के बाद इस प्रक्रिया को रोके जाने की चर्चा थी, लेकिन टाटा ट्रस्ट्स ने साफ कर दिया है कि चयन समिति आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के अनुसार उत्तराधिकारी की तलाश जारी रखेगी।
यदि टाटा संस का आईपीओ आता है, तो यह भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा आईपीओ साबित होगा। महज एक प्रतिशत हिस्सेदारी की बिक्री से 15,000 से 20,000 करोड़ रुपये जुटने का अनुमान है, जिससे कंपनी का कुल मूल्यांकन लगभग 20 लाख करोड़ रुपये (230 बिलियन डॉलर) बैठता है।