देश में कॉरपोरेट विवादों और दिवाला मामलों के निपटारे से जुड़ी शीर्ष न्यायिक संस्थाओं- नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT)- की प्रशासनिक स्वायत्तता पर उच्चतम न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय (MCA) ने एनसीएलटी और एनसीएलएटी को पूरी तरह से 'हायजैक' कर लिया है, जिससे इन न्यायिक संस्थानों की स्वायत्तता प्रभावित हो रही है। शीर्ष अदालत ने ट्रिब्यूनल अध्यक्षों को नियुक्तियों का पूरा अधिकार देने और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) या कर्मचारी चयन आयोग (SSC) के माध्यम से स्थायी भर्ती प्रक्रिया शुरू करने की वकालत की है।
उच्चतम न्यायालय एनसीएलटी और एनसीएलएटी में कार्यरत संविदा (कांट्रेक्चुअल) कर्मचारियों द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने तर्क दिया कि ये कर्मचारी पिछले छह वर्षों से सेवा दे रहे हैं और उन्हें अचानक पद से नहीं हटाया जाना चाहिए। उन्होंने अदालत को अवगत कराया कि 1 या 2 नवंबर को मौजूदा कर्मचारियों को हटाकर एक स्वतंत्र निजी कंपनी (ठेकेदार) के माध्यम से नई नियुक्तियां की जाने की संभावना है। अरोड़ा ने दलील दी कि एनसीएलटी के भर्ती नियमों में नियमितीकरण का प्रावधान है, इसलिए कर्मचारियों को पूरी तरह से बाहर करना मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 का उल्लंघन होगा।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने टिप्पणी की कि मंत्रालय न्यायाधिकरण पर पूरा नियंत्रण रखना चाहता है, जो कि बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
मुख्य न्यायाधीश ने संविदा के आधार पर होने वाली नियुक्तियों को पूरी तरह अनुचित बताया। अपने अनुभवों को साझा करते हुए सीजेआई ने बॉम्बे का एक उदाहरण दिया, जहां संविदा कर्मचारी मूल रिपोर्ट लेकर फरार हो गए थे और एफआईआर दर्ज करानी पड़ी थी। कोर्ट ने कहा कि संविदा कर्मचारी न्यायिक सदस्यों को परेशान करते हैं और तकनीकी सदस्यों द्वारा भी हेरफेर किए जाने की आशंका बनी रहती है। शीर्ष अदालत ने निजी ठेकेदार कंपनियों को भंग करने और संविदा आधारित कर्मचारियों के स्थान पर संस्थागत रूप से सक्षम कर्मचारियों को तैनात करने की बात कही।
मामले के व्यापक जनहित को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए अल्पकालिक और दीर्घकालिक समाधानों का खाका प्रस्तुत किया:
सुप्रीम कोर्ट द्वारा एनसीएलटी और एनसीएलएटी की स्वायत्तता को लेकर की गई यह टिप्पणी भारत के कॉरपोरेट ट्रिब्यूनल ढांचे में प्रशासनिक सुधारों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है। संविदात्मक व्यवस्था के स्थान पर यूपीएससी व डेपुटेशन के माध्यम से पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया अपनाने से न केवल ट्रिब्यूनल की न्यायिक गरिमा और स्वतंत्रता बहाल होगी, बल्कि कॉरपोरेट विवादों के निष्पक्ष निपटारे को भी बल मिलेगा।