ESZ: आज का फैसला एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया गया, जहां अदालत की पर्यावरण पीठ वन मंजूरी और वन भूमि की सुरक्षा की समीक्षा कर रही थी। इस महीने की शुरुआत में मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा था कि वन्यजीव अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों के आसपास पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों के भीतर विकास कार्य पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने संरक्षित वनों, राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों की बाहरी चारदिवारी से कम से कम एक किमी के दायरे में पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों (ईएसजेड) के भीतर विकास कार्य पर पूर्ण प्रतिबंध को हटा दिया। शीर्ष अदालत ने कहा है कि संरक्षित वन, राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य के आसपास एक किमी के ईएसजेड को अनिवार्य करने का उसका पहले का आदेश उन मामलों में लागू नहीं होगा जहां विकास के लिए एक मसौदा या अंतिम अधिसूचना पहले ही जारी की जा चुकी है।
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जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संजय करोल की पीठ ने अपने 3 जून, 2022 के उस आदेश को संशोधित किया जिसमें ऐसे ईएसजेड निर्धारित किए गए थे, जहां किसी भी विकास कार्य की अनुमति नहीं दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हमारा मानना है कि इस तरह के निर्देश को लागू करना असंभव है। हमारा विचार है कि यदि इस तरह के निर्देश को जारी रखा जाता है तो मानव-पशु संघर्ष से बचने के बजाय यह उसको तीव्र करेगा। मौजूदा कानून में बड़े पैमाने पर निर्माण या किसी भी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए अंतर्निहित सुरक्षा उपाय हैं जो वन्यजीव आवास के लिए हानिकारक हो सकते हैं।
दैनिक जीवन में बाधा डालना मकसद नहीं
पीठ ने कहा है कि ईएसजेड घोषित करने का उद्देश्य नागरिकों की दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों में बाधा डालना नहीं, बल्कि वनों की रक्षा करना है। देश में सैकड़ों गांव ईएसजेड के भीतर स्थित हैं। यदि वहां किसी भी उद्देश्य के लिए कोई स्थायी निर्माण की अनुमति नहीं होगी तो एक ग्रामीण जो अपने घर का पुनर्निर्माण करने के इच्छुक हैं, उन्हें अनुमति नहीं दी जाएगी।