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Sir Ratan Tata Trust: नेविल टाटा की नियुक्ति लटकी, रतन टाटा ट्रस्ट की बैठक रद्द

Sun, 18 Jan 2026 11:25 PM IST
लव गौर बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Sir Ratan Tata Trust: रविवार (17 जनवरी) को होने वाली सर रतन टाटा ट्रस्ट के बोर्ड की प्रस्तावित मीटिंग रद्द हो गई। जिससे ट्रस्ट में बतौर ट्रस्टी नेविल टाटा की नियुक्ति में देर होती दिखाई दे रही है। टाटा ट्रस्ट के बोर्ड की बैठक रद्द होना इस बात का साफ संकेत है कि टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा के बेटे नेविल टाटा की नियुक्ति पर अभी ट्रस्टीज के बीच एक राय नहीं बन पाई है।
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टाटा ग्रुप - फोटो : Tata Group
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विस्तार
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कोरम की कमी के कारण सर रतन टाटा ट्रस्ट (एसआरटीटी) की प्रस्तावित बोर्ड बैठक को रद्द कर दिया गया है। इसमें टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा के बेटे नेविल टाटा को ट्रस्टी नियुक्त करने पर विचार होना था। यह बैठक दो महीने से अधिक समय बाद रद्द हुई है, जब एसआरटीटी के बोर्ड में नेविल टाटा को शामिल करने का पहला प्रयास विफल रहा था।
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इस वजह से रद्द की गई बैठक
एसआरटीटी के पास टाटा संस में 23.6 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जो 180 अरब डॉलर से अधिक के टाटा समूह की प्रमोटर होल्डिंग कंपनी है। सूत्रों ने बताया, सभी ट्रस्टी उपस्थित नहीं हो सके, इसलिए बैठक रद्द कर दी गई। किसी भी ट्रस्टी की नियुक्ति के लिए सभी ट्रस्टियों की उपस्थिति अनिवार्य होती है। बैठक अगले कुछ दिनों में पुनर्निर्धारित की जा सकती है। हालांकि, अन्य लोगों का कहना है कि यह रद्द करना ट्रस्टियों के बीच नियुक्ति पर आम सहमति तक पहुंचने के लिए अधिक समय लेने के लिए हो सकता है।

एसआरटीटी के ट्रस्टी नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन, विजय सिंह, जिमी एन टाटा, जहांगीर एचसी जहांगीर और डेरियस खंबाटा हैं। पिछले नवंबर में नेविल टाटा और समूह के पूर्व अधिकारी भास्कर भट्ट को श्री दोराबजी टाटा ट्रस्ट (एसडीटीटी) में नियुक्त किया गया था। इसकी टाटा संस में 28 प्रतिशत हिस्सेदारी है। हालांकि, उन्हें एसआरटीटी में नियुक्त नहीं किया जा सका। टाटा संस में अन्य टाटा-संबद्ध ट्रस्टों के पास 13.8 प्रतिशत हिस्सेदारी है। कुछ का कहना है कि वेणु श्रीनिवासन की उठाई गई आपत्ति के कारण भी बैठक रद्द होना हो सकता है।
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महाराष्ट्र सरकार ने किया था नियमों में बदलाव
श्रीनिवासन को पिछले साल अक्तूबर में सर्वसम्मति से आजीवन ट्रस्टी बनाया गया था। उनको भी कानूनी और नियामक जरूरतों के अनुपालन में अपनी नियुक्ति पर पुनर्विचार का सामना करना पड़ा था। महाराष्ट्र सरकार ने सितंबर में महाराष्ट्र सार्वजनिक ट्रस्ट अधिनियम में संशोधन किया था, जिसके तहत आजीवन ट्रस्टियों की संख्या बोर्ड की कुल संख्या के एक-चौथाई तक सीमित कर दी गई। जिस ट्रस्ट के डीड में इसका उल्लेख नहीं है, वहां निश्चित कार्यकाल अनिवार्य कर दिया गया।

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