भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कंपनियों के प्रस्तावों पर म्यूचुअल फंड कंपनियों के मताधिकार (वोट) के प्रयोग के संबंध में दिशानिर्देश जारी किए हैं। नियामक ने यह कदम साझा कोषों के इस तरह फैसलों में पारदर्शिता सुधारने तथा उन्हें मताधिकार का इस्तेमाल करते समय यूनिटधारकों के सर्वश्रेष्ठ हित में करने को प्रोत्साहित करने के लिए उठाया है।
सेबी ने सर्कुलर में क्या कहा?
सेबी के द्वारा जारी सर्कुलर में कहा गया है कि म्यूचुअल फंड कंपनियों (उनकी पैसिव निवेश योजना इंडेक्स फंड सहित), एक्सचेंज ट्रेडेड कोषों को ऐसी कंपनियों के किसी संबंधित पक्ष के साथ लेनदेन तथा उनमें कंपनी के संचालन के मुद्दों पर अपने मत का प्रयोग अनिवार्य रूप से करना होगा जिनमें उन्होंने निवेश कर रखा है।
कॉरपोरेट गवर्नेंस के मामले में कंपनियों को देना होगा मत
इसके अलावा म्यूचुअल फंड कंपनियों को कामकाज के संचालन यानी कॉरपोरेट गवर्नेंस के मामले में अपना मत देना होगा। इनमें कंपनी के गठन में बदलाव, विलय और अन्य कॉरपोरेट पुनर्गठन, अधिग्रहण रोधी प्रावधान के अलावा पूंजी ढांचा शामिल है।
अन्य मुद्दों पर भी मताधिकार जरूरी
इसके अलावा शेयर विकल्प योजना और प्रबंधन के मुआवजे से संबंधित मुद्दों, कॉरपोरेट और सामाजिक दायिवत्व मुद्दों, निदेशकों की नियुक्ति या उन्हें हटाने तथा यूनिटधारकों के हितों को प्रभावित करने वाले अन्य मुद्दों पर भी मताधिकार जरूरी होगा। यदि मतदान के दिन म्यूचुअल फंड का कोई आर्थिक हित नहीं है, तो उन्हें अनिवार्य मतदान से छूट दी जा सकती है।
निवेशकों के हितों का संरक्षण करना है सेबी का उद्देश्य
मालूम हो कि भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) की स्थापना भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 के प्रावधानों के अनुसार 12 अप्रैल 1992 को हुई थी। प्रतिभूतियों में निवेश करने वाले निवेशकों के हितों का संरक्षण करना, प्रतिभूति बाजार के विकास का उन्नयन करना तथा उसे विनियमित करना और उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक विषयों का प्रावधान करना।