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सेबी की सख्ती: NCDEX और MSE की डेरिवेटिव्स बाजार में एंट्री पर रोक, नियामक ने कहा- 'हवा में महल न बनाएं

Tue, 10 Feb 2026 02:19 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सेबी ने एनसीडीईएक्स और एमएसई को इक्विटी डेरिवेटिव्स लॉन्च करने से रोक दिया है। नियामक ने कहा है कि पहले कैश मार्केट मजबूत करें उसके बाद इस क्षेत्र में कदम रखें। क्या है पूरा मामला, आइए विस्तार से समझें।
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शेयर बाजार नियामक सेबी - फोटो : PTI
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विस्तार
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भारतीय शेयर बाजार में 'फ्यूचर एंड ऑप्शंस' के बेतहाशा बढ़ते क्रेज और खुदरा निवेशकों के जोखिम को देखते हुए बाजार नियामक सेबी ने एक बड़ा और कड़ा फैसला लिया है। सेबी ने देश के दो उभरते एक्सचेंजों- नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज (एनसीडीईएक्स) और मेट्रोपोलिटन स्टॉक एक्सचेंज (एमएसई) की इक्विटी डेरिवेटिव्स सेगमेंट में एंट्री पर फिलहाल रोक लगा दी है।

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नियामक ने दो टूक शब्दों में इन एक्सचेंजों को सलाह दी है कि वे डेरिवेटिव्स का आकर्षक बाजार शुरू करने से पहले अपने 'कैश मार्केट' (शेयर ट्रेडिंग) के बिजनेस को मजबूत करें। सेबी का यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए है कि बिना मजबूत आधार के डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग को बढ़ावा न मिले।

'पहले लिक्विडिटी लाएं, फिर डेरिवेटिव्स पर आएं'

सूत्रों के मुताबिक, सेबी ने साफ कहा है कि किसी भी नए एक्सचेंज को डेरिवेटिव्स लॉन्च करने की अनुमति तब तक नहीं दी जाएगी जब तक कि वे एक लिक्विड (तरल) कैश मार्केट स्थापित नहीं कर लेते।

  • छह महीने का नियम: सेबी चाहता है कि कैश इक्विटी और इक्विटी डेरिवेटिव्स के लॉन्च के बीच कम से कम छह महीने का अंतर हो।
  • प्राइस डिस्कवरी: एक्सचेंजों को यह साबित करना होगा कि उनके कैश मार्केट में पर्याप्त भागीदारी, लिक्विडिटी और सटीक 'प्राइस डिस्कवरी' हो रही है। नियामक नहीं चाहता कि नए खिलाड़ी बिना किसी ठोस आधार के डेरिवेटिव ट्रेडिंग को और हवा दें।
  • टेक्नोलॉजी अपग्रेड: सेबी ने दोनों एक्सचेंजों को इक्विटी सेगमेंट में उतरने से पहले अपनी तकनीक को अपग्रेड करने का भी निर्देश दिया है।

क्या है सेबी की असर चिंता?

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यह फैसला ऐसे समय में आया है जब भारत का इक्विटी डेरिवेटिव बाजार आसमान छू रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, भारत में डेरिवेटिव्स का प्रीमियम अब कैश मार्केट के आकार का लगभग दोगुना हो चुका है, जबकि प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में यह अनुपात महज 2% से 3% है।

सरकार और सेबी इस असंतुलन को लेकर चिंतित हैं। हाल ही में सरकार ने ट्रेडिंग वॉल्यूम कम करने के लिए ट्रांजेक्शन टैक्स भी बढ़ाया था। अध्ययनों से पता चला है कि एफएंडओ में 90% खुदरा निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ता है, जो नियामक की सतर्कता का एक बड़ा कारण है।

एक्सपेंशन प्लान और बड़ी फंडिंग पर असर
एनसीडीईएक्स (जो मुख्य रूप से कृषि कमोडिटीज में ट्रेड करता है) और एमएसई (जो करेंसी डेरिवेटिव्स में सक्रिय है) दोनों ने अपने कारोबार में विविधता लाने के लिए सेबी से मंजूरी मांगी थी। इन दोनों एक्सचेंजों ने इक्विटी विस्तार के लिए हाल ही में भारी-भरकम फंड जुटाया था:

  • एनसीडीईएक्स: 2025 में एक्सचेंज ने सिटाडेल सिक्योरिटीज और टॉवर रिसर्च  जैसी दिग्गज ग्लोबल फर्मों सहित 61 निवेशकों से 7.7 अरब रुपये ($85 मिलियन) जुटाए थे।
  • एमएसई: इसने पीक एक्सवी वेंचर पार्टनर्स और ग्रो व जीरोधा जैसी ब्रोकरेज फर्मों से 12 अरब रुपये जुटाए थे। सेबी के इस निर्देश के बाद इन एक्सचेंजों की विस्तार योजनाओं को बड़ा झटका लग सकता है।

एनएसई का दबदबा कायम रहेगा
सेबी के इस कदम का सीधा मतलब है कि भारतीय डेरिवेटिव्स बाजार में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का एकछत्र राज फिलहाल जारी रहेगा। वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ एक्सचेंजों के डेटा के अनुसार, दुनिया भर में ट्रेड होने वाले इंडेक्स ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट्स में एनएसई की हिस्सेदारी 70% से अधिक है। नए खिलाड़ियों के लिए एफएंडओ बाजार में प्रवेश की बाधाएं बढ़ाकर सेबी ने साफ कर दिया है कि वह बाजार की सुरक्षा और स्थिरता के साथ कोई समझौता नहीं करेगा, भले ही इसके लिए प्रतिस्पर्धा को कुछ समय के लिए रोकना पड़े।

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