SBI Research: रिपोर्ट में कहा गया है, 'वित्त वर्ष 2023 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर में तिमाही क्रमिक आधार पर गिरावट का रुख रहा है। चुनिंदा तिमाहियों में यह तर्क दिया गया है कि भारत राज कृष्ण द्वारा गढ़ी गई विकास दर (3.5-4 प्रतिशत) की ओर जा रहा है, जो 1947-1980 की अवधि में दौरान विकास पर हावी रही थी।'
एसबीआई रिसर्च ने अपनी इकोरैप रिपोर्ट में कहा है कि भारत के 'हिंदू विकास दर' की ओर बढ़ने का तर्क गलत सोच पर आधारित और पक्षपातपूर्ण है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह बचत और निवेश से संबंधित आंकड़ों को देखते हुए यह अपरिपक्व प्रतीत होता है। विकास की हिंदू दर शब्द 1978 में अर्थशास्त्री राज कृष्ण की ओर से गढ़ा गया था। उन्होने वर्ष 1947-1980 के दौरान सकल घरेलू उत्पाद के संदर्भ में लगभग 3.5-4.0% की आर्थिक वृद्धि की बात कही थी।
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रिपोर्ट में कहा गया है, 'वित्त वर्ष 2023 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर में तिमाही क्रमिक आधार पर गिरावट का रुख रहा है। चुनिंदा तिमाहियों में यह तर्क दिया गया है कि भारत राज कृष्ण द्वारा गढ़ी गई विकास दर (3.5-4 प्रतिशत) की ओर जा रहा है, ये 1947-1980 की अवधि में दौरान विकास पर हावी रही थी।'
इकोरैप रिपोर्ट में कहा गया है, 'बचत और निवेश के आंकड़ों के आधार पर हम इसे देखें तो यह गलत तरीके से बनाया गया, पक्षपातपूर्ण और प्रीमैच्योर्ड लगता है। एसबीआई रिसर्च की यह रिपोर्ट आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के उस बयान के बाद आया है जिसमें उन्होंने मीडिया से कहा था कि भारत की आर्थिक वृद्धि राज कृष्ण के 'हिंदू विकास दर' के करीब है।
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इसके अलावा एसबीआई रिसर्च ने तर्क दिया कि कुल सकल पूंजी निर्माण (जीसीएफ) में सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों का संस्थागत हिस्सा वित्त वर्ष 12 से जीडीपी के क्रमशः लगभग 10 प्रतिशत और 34 प्रतिशत पर लगभग स्थिर रहा है।
विश्व बैंक के अनुसार सकल पूंजी निर्माण में अर्थव्यवस्था की अचल संपत्तियों के अलावा निवेश और इन्वेंट्री के स्तर पर शुद्ध परिवर्तन शामिल हैं। सरकार की ओर से सकल पूंजी निर्माण 2021-22 में 11.8 प्रतिशत के उच्च स्तर पर पहुंच गया, जो 2020-21 में 10.7 प्रतिशत था। एसबीआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि इसका निजी क्षेत्र के निवेश पर भी प्रभाव पड़ा, जो इसी अवधि में 10 प्रतिशत से बढ़कर 10.8 प्रतिशत हो गया।